दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हमेशा यही शक़ रहता है कि लोग उनके विरुद्ध षड़यंत्र रच रहे हैं। और ये लोग यह सोच सोच कर अपने इर्द गिर्द ऐसी दीवार बना लेते हैं कि कुछ दिनों बाद इन्हें यह विश्वास हो जाता है कि दुनिया के किसी भी कोने में यदि कुछ भी होता है तो वह सब उनके विरुद्ध हो रहे षड़यंत्र का ही हिस्सा है। यदि अमेरिका अफ्गानिस्तान पर हमला करता य फिर लादेन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर तो भी ऐसे लोगों को लगता है कि ये सब घटनाक्रम भी उनके खिलाफ हो रहे षड़यंत्र का हिस्सा हैं। यदि गल्ति से इन लोगों का नसबंदी का ऑपरेशन फेल हो जाए तो ये लोग कहेंगे कि यह डॉक्टरों का इनके विरुद्ध कोई षड़यंत्र है। जब ऐसे लोग अपने इहलोक में वर्षों का शतक लगा कर उहलोक में जाते हैं तो ये इस बात को नहीं मानते कि वे एक स्वभाविक क्रिया के स्वरूप अपना शरीर त्याग रहे हैं बल्कि यह कहते है कि उनके परिवार वाले उनके विरुद्ध षड़यंत्र कर के उन्हें मार रहे हैं।
वह मुझे जब भी मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे वह सारे शहर से ही नहीं बल्कि सारी दुनिया से तृस्त है। उसके चेहरे पर हमेशा लोगों को बेबकूफ बनाने वाली एक मुस्कान खिली रहती है। इसमें गलती उसकी नहीं है दरअसल जब दर्शनशास्त्र, हिंदी साहित्य, अपराध शास्त्र और रंगमंच चारों की कॉकटेल बन जाए तो एक नया नशा तैयार होता है। दर्शनशास्त्र चीज़ों को देखने का एक नया नज़रिया देता है। हिन्दी साहित्य भाषा को आकर्षित बना देता है। अपराध शास्त्र हर चीज़ के पीछे किसी षड़यंत्र के होने का बोध कराता है। और रंगमंच एक बहुत ही अच्छा पटकथा लेखक और अभिनेता बना देता है। उनके अन्दर भी ये चारों गुण मौज़ूद थे। हालांकि वे एक सरकारी महकमे में कार्य करते थे परंतु यह उनका पार्टटाइम बिज़नेस था। मुख्य रूप से उनकी एक सपने बेचने की दुकान थी जिसे उन्होंने शायद अपनी पत्नी या फिर किसी और पारिवारिक सदस्य के नाम पर खोला था। अपने देश मे सरकारी नौकरियां अधिकतर पार्टटाइम ही होती हैं क्यों कि इन लोगों का मुख्य व्यवसाय कुछ और ही होता है आखिर ऐसा हो भी क्यों न अपने यहां सरकारें भी तो पार्टटाइम ही होती हैं।
हां तो हम बात कर रहे थे उन महाशय की। तो इनका काम है सपने बेचना। जिसे पूरे शहर में किसी कॉलेज में कहीं प्रवेश नहीं मिल रहा हो वो इनके सपने बेचने की दुकान यनि कि कॉलेज में आराम से प्रवेश लेकर पढ़ सकता है। इनके इस कॉलेज की एक खास बात और है और वो यह कि यहां पढ़ने वालो की सूची में वो सभी लोग मिल जाएंगे जिनका पढ़ाई से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इनके कॉलेज में कुल मिलाकर चार कमरे हैं जिनमें से एक पर इनका खुद का अधिकार है और बाकी बचे तीन में से एक में ऑफिस के नाम पर एक काऊंटर है और दो में कुछ कुर्सियां यह दिखाने के लिए लगा रखीं है कि कभी कभी यहं पर क्लास लग जाती है। हर सत्र के प्रारम्भ में यह कॉलेज ऐसे सजाया जाता है जैसे कि बारात आने से पहले दुल्हन को सजाया जाता है। शहर के किसी एक कोने से एक ऐसी सुन्दर लड़की को ढूंढ कर लाया जाता है जो ज़रूरतमंद हो, सुन्दर हो और जिसने अभी अभी योवन की दहलीज़ पर कदम रखा हो। आखिर चूहे को पिंजरे की तरफ आकर्षित करने के लिए रोटी का टुकड़ा तो रखना ही पड़ता है। तो ये होती हैं तैयारियां। उसके बाद फिर शुरू होता है बच्चों के आने जाने का सिलसिला। प्रवेश के लिए बच्चों को लुभाने का सिलसिला।
जब कोई लड़का प्रवेश की जानकारी के लिए आता है तो सबसे पहले वो मुखातिब होता है फ्रंट ऑफिस में बैठी हुई अधखिली कली से जिसे खिलाने की इच्छा उस भंवरे के मन में अनायास ही जाग्रत हो जाती है। ये अधखिली कली भोजन के पहले एपेटाईज़र सूप का काम करती है। उसके बाद फिर दूसरे चरण में उस लड़के को पेश किया जाता है एक और बाला के सामने जो फ्रंट ऑफिस वाली लड़की से थोड़ी ज़्यादा प्रोफेशनल है इसीलिए इसे प्रशासनिक अधिकारी कहा जाता है। इसके चेहरे पर एक मुस्कान हमेशा खिली रहती है जो हंसी तो फंसी वाले फंडे का उपयोग लड़को को फंसाने के लिए करती है। लड़के भी उसके पर्वत से तने हुए विराट योवन और वात्स्यायन को मात देती शारीरिक भावभंगिमाओं की चिकनी सतह पर बड़े आराम से फिसल जाते हैं। इसके बाद उस लड़के को ले जाया जाता है इन महाशय के पास जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं। इस आधे फंसे हुए लड़के को देख कर इन महाशय के चहरे पर एक खास चमक आ जाती है जैसी किसी भेड़िये के चहरे पर दिखाई देती है जब उसके सामने कोई मेमना आ जाता है। अब ये अपने चहरे पर एक मुस्कान ले कर उस लड़के के अन्दर एक साथ कई सारी भावनाओं के विंड चाइम्स छेड़ देते है। अपने कक्ष में बिठाकर उस लड़के को सारी दुनिया का सफर करा देते हैं। वहीं बैठे बैठे उसे कहां कहां के सपने दिखा देते है। और अंततः शिकार जाल में फंस जाता है।
इन महाशय के जीवन में यह दिनचर्या आम हो गई है। और जब इन्हें अपने जीवन में रोमांच की कमी महसूस होती है तो यह महाशय अपने जान-पहचान के लोगों के बीच से एक व्यक्ति का चुनाव करते हैं। उसके बाद फिर ये एक पटकथा का लेखन करते हैं जिसके केंद्र मे होता है इनका यह कॉलेज और नायक होते हैं ये खुद परंतु दुर्भाग्यवश खलनायक बन जाता है वह चयनित व्यक्ति जिसका चुनाव ये अपने जान-पहचान के लोगों में से करते हैं।
एक दिन मुझे भरी दोपहर इनका फोन आया “बेटा मैं तुम्से मिलना चाहता हूं। बहुत ज़रूरी काम है।“ मैं भी उनकी आदत से अनभिज्ञ अपने सारे काम छोड़ कर उनके पास पहुंचा। मैं जैसे ही उनके रूम पर पहुंचा तो मुझे देख कर उनके चेहरे पर ऐसी तृप्ति आई जैसी कि मेमने को देख कर किसी भेड़िए के मुख पर आती है। उन्होने मुझे बड़े प्यार से बिठाया तो मैं समझ गया कि आज फिर कोई नई जासूसी कहानी सुननी पड़ेगी। मैं अपने आप को तैयार कर ही रहा था कि उन्होने झट से कहा कि “बेटा मुझे लग रहा है कि हमारे प्रतियोगी कॉलेज वाले षड़यंत्र रच रहे हैं कि किसी तरह अपना कॉलेज बंद हो जाए।“ मैने अपने मन मे कहा कि प्लॉट तो ऐसे गढ़ा जा रहा है जैसे कि इंडिया और पाकिस्तान का मैच चल रहा हो और दोनो टीमों के खिलाड़ी अपना अपना खेल खेलने की जगह उल्टे सीधे थ्रो मार कर दोनो टीमों के खिलाड़ियो को चोटिल करने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हों। फिर उनसे लगभग 2 घंटे बात हुई जिसका निष्कर्ष यह निकला कि सारे शहर के कॉलेजों ने मिलकर यह षड़यंत्र रचा है कि किसी तरह इनका कॉलेज बन्द हो जाए। मैंने उनकी यह बातें सुनी उनका रस लिया और फिर आकर अपने काम में लग गया।
किसी तरह दो महीने निकल गये और इन दो महीनो मे इत्तेफाक़ से उनके और उनके कॉलेज के छात्रों के बीच कुछ विवाद हुआ और एक साथ 12 लड़कों ने अपना प्रवेश इस कॉलेज से रद्द करा कर दूसरे कॉलेज में करवा लिया। और मेरी बद्किस्मती से वे सभी छात्र मेरे से बहुत अच्छे से बात करते थे। अब तो इन महाशय की बाछें ही खिल गईं। इन्हें बहुत आसानी से एक ऐसा सॉफ्ट टार्गेट मिल गया जिस पर ये इल्ज़ाम भी लगा सकते थे और उसे सुना भी सकते थे तो फिर उन्होंने इस शुभ कार्य मे देरी नहीं की और उसी समय मुझे फोन कर के आने को कहा। मैं भी हमेशा की तरह निश्चिंत हो कर उनके पास गया। मेरे पहुंचते ही उन्होने मेरा इंटेरोगेशन शुरू कर दिया। “तुम आमुक तारीख को आमुक समय पर कहां थे? किसके साथ थे? क्या कर रहे थे?” मैं इस तरह मशीनगन से छूटती गोलियों कि तरह आते इतने सवालों से परेशान हो कर बोला कि मैं कही घड़ी देख कर थोड़ी खड़ा होता हूं।” बस उन्हें मिल गया मौका उन्होंने छोटते ही बोला कि तुम भी विपक्षियों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध षड़यंत्र कर रहे हो। उनकी इस बात से सारी पिक्चर मेरे सामने थोड़ी थोड़ी क्लीयर होने लगी। मैं धीरे धीरे सब कुछ समझने लगा और जब मैं सब कुछ समझ गया तो मैं अब इस स्थिति का रस लेने लगा। बस वे जो भी आरोप प्रत्यारोप लगाते मैं उन्हे चुप चाप सुनता और फिर आकर अपने काम में लग जाता।
ऐसे ही जब तीन महीने बीत गए तो मैने उनसे मिलना जुलना एक दम बन्द कर दिया। वे अगर कभी बुलाते भी तो मैं उनसे मिलने नही जाता और जब उन्होने परेशान हो कर एक दिन कहा कि क्या बात है मुझे तुमसे एक बहुत ज़रूरी काम है और तुम हो कि मिलने ही नहीं आ रहे हो। तो मैने भी इस बार उनसे कह दिया कि दरअसल मैं आपसे मिलना नहीं चाहता क्यों कि मैं अभी कुछ ज़रूरी कामो में लगा हुआ हूं और अगर मैं अभी आपसे मिलने आऊंगा तो फिर वही आप कोई नया मनगढ़ंत आरोप प्रत्यारोप लगाएंगे और फिर मेरा टाइम खराब होगा। और मैं इस समय यह नहीं चाहता। मेरी तरफ से ऐसा अप्रत्याशित जवाब सुन कर बे चकरा गए। और फिर उनकी मुझ से बात चीत नहीं हुई। परंतु अभी कुछ ही दिनों पहले मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी तबियत ज़रा खराब चल रही है। उसके अगले दिन मेरी उन डॉक्टर साहब से भी नमस्कार चमत्कार हो गई जो उनका इलाज कर रहे थे। मैंने डॉक्टर से बात की तो पता चला कि उन्हें एक खास किस्म की कब्ज़ हो गई है पर खुद डॉक्टर परेशान है कि यह कब्ज़ किस चीज़ की है। वे बड़े अचंभे से बता रहे थे कि उन्होंने जुलाब लगने की सारी दवाईयां दे कर देख लीं परंतु सब की सब बे असर। मेरा मन किया कि मैं उन डॉक्टर साहब को बता दूं कि यह किसी और चीज़ की नहीं बल्कि उनके पेट मे पक रही एक नई षड़यंत्र कथा का कब्ज़ है जिसे सही करने के लिए किसी दवाई की नहीं बल्कि एक इंसान की ज़रूरत है जो उनकी इस षड़यंत्र कथा का खलनायक बन सके। जाते जाते डॉक्टर साहब मुझ से बोले कि “चलिए आप तो उनके बहुत खास हैं आप खुद ही देख लीजिये कि उनकी तबीयत कैसी है।“ मैने चलते चलते उन्हें नमस्कार किया और कहा कि मांफ कीजिए अभी थोड़ा ज़रूरी काम से जा रहा हूं और वैसे भी फिलहाल मेरा जुलाब की गोली बनने का कोई मूड नहीं है।
(यह व्यंग्य पूर्णतः काल्पनिक है अतः पाठको से अनुरोध है कि इसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ कर न देखें)
Saturday, August 16, 2008
जुलाब की गोली
लेखक:-
विकास परिहार
at
03:02
श्रेणी:- कथायें एवं किस्से, व्यंग्य
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