Tuesday, October 2, 2007

नग्नता

स्वर्थ सिद्धी में मग्न।
आज शब्द हुए नग्न।
लज्जा को तज।
हम निर्लज्ज।
खींसे निपोरते झांकते हैं।
एक दूजे की नग्नता को ताकते हैं।

1 comment:

Sanjeeva Tiwari said...

अरे वाह विकास भाई, आपकी क्षणिका ने तो गंभीर बात कह दी ।

धन्‍यवाद बेहतर शव्‍द संयोजन व भाव के लिए ।

'आरंभ' छत्‍तीसगढ की धडकन

© Vikas Parihar | vikas