Thursday, November 1, 2007

तुम्हारे वास्ते हैं

तुम्हारे वास्ते हैं मेरे जीवन के धारे।
तुम्हीं हो मेरे साथी तुम्हीं मेरे सहारे।

ये कलियाँ,फूल,भंवरे,ये सूरज चाँद तारे,
तुम्हारे ही लिए हैं यहाँ सारे नज़ारे।

है मुझको प्यार तुमसे तुम्हे कैसे बताऊं,
हो तुम तो मेरे हमदम मुझे जाँ से भी प्यारे।

तुम्हारे बिन तो जैसे सज़ा है मेरा जीना,
तुम्हारे बिन अकेला मैं जाऊंगा कहाँ रे।

बहुत समझाना चाहा मगर फिर भी न माना,
है दिल को तेरी चाहत और हम दिल के मारे।

मुहब्बत के सफर में फंसी है मेरी कश्ती,
मुझे तुम जो मिलो तो मिलें मुझ को किनारे।

3 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया है.

011010 said...

My friend, now you understand. I hope that you can read now.

011010 said...

Thank you, but this is a small literary game.
The script is basically a robot that can feel.
This poem is free verse, as pos modernist literature. When the man abandons reason and gives strength to feelings.
The sense of the whole philosophy postmodernista blog is, the poem, the hyphen, philosophy, and attitude of the author.
This is the last poem. I start with the last poem and gradually came to the first poem. I am very complicated.

Thanks

Greetings
01

© Vikas Parihar | vikas