Sunday, March 23, 2008

तन्हा रातें

तुम क्या जानो कि कैसे डसती हैं तन्हा रातें।

हम पर हर रोज़ ही हंसती हैं तन्हा रातें।

कौन कहता है कि हर चीज़ यहां महगी है,

यहां तो धूल से भी सस्ती है तन्हा रातें।

दिन तो कट जाते हैं जैसे तैसे,

बन कर के आग बरसतीं हैं तन्हा रातें।

कहीं नहीं है यहां प्यार अम्न की खुश्बू,

डर-औ-दहशत की बस्ती है यहां तन्हा रातें।

3 comments:

मीत said...

दिन तो कट जाते हैं जैसे तैसे,
बन कर के आग बरसतीं हैं तन्हा रातें।
अच्छा है.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा..लगे रहिये.

elCarretero said...

Hey friend ... not create .. is that I am a bit careless but not yet I forget my commitment ... I'm still looking for a publisher for you. In the United States is difficult because the pile of things that call, but believe me that something'm going to find.

hugs
Hannibal

© Vikas Parihar | vikas