Saturday, September 29, 2007

सरहदें

सरहदें आदमी को क्या देंगी।
दो दिलों में ये फासला देंगी।

दे नहीं सकती हैं ये चैन-ओ-अमन।
नफरतों और दंगों से मुक्त वतन।
एक ऐसा तन कि जिसमें हो उनमुक्त ज़हन।
सरहदें दे नहीं सकतीं किसी को जीवन।
ये तो मरने का मश्विरा देंगी।
सरहदें आदमी को क्या देंगी।

इन्हीं के कारण कई अदाओं के उजड़े सावन।
बहुतों की टूटी राखियां बहुतों के उजड़े योवन।
कैयों के छूटे दोस्त तो कई कोखों के उजड़े जीवन।
सरहदों ने ही उजाड़े हैं हज़ारों मधुवन।
ये न बहारों की कोई फज़ां देंगी।
सरहदें आदमी को क्या देंगी।

1 comment:

neeshoo said...

amit bahi bahut sahi aapne accha likha hai akhir sarhaen hamen kya deti hai.

© Vikas Parihar | vikas