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Friday, October 3, 2008

नवरात्री का विरोधाभास

होटल के प्रांगण में
चल रहा था जश्न
झूम रहे थे लोग
लिये डांडिया की स्टिक हांथों में,
गहरी लिपस्टिक लगे हुए होठों पर
फैली थी मुस्कान।
डस्टबिन में पड़ी हुई थीं
बहुत सारी आधी खाई हुई प्लेटें,
यही होती है समृद्धि की पहचान।
लोग खुश थे,
निश्चिंत थे।
मगर होटल के बाहर
बैठा है एक वृद्ध
इस आस मे
कि पड़ेगी किसी
समृद्ध की नज़र
इस पर
और वह
डालेगा कुछ चिल्लर
इसके कटोरे में।
जिस से वह खरीदेगा कुछ आटा
और भरेगा पेट अपनी बीवी
और तीन बच्चों का।

नहीं तो आज फिर होगा उपवास
नवरात्री के पर्व पर
माता का नाम लेकर।

Sunday, May 11, 2008

मौन और संगीत

क्या होता संगीत मौन में पूछ रहे क्या कोलाहल से।
समय ने जो भी घाव दिए हैं कहां धुले हैं वो दृगजल से।

अपने मन में हमने हरदम बैर-भाव ही तो पाले हैं।
फूट रहे हैं जो इस जग में वो अपने ही तो छाले हैं।
देख के स्थिति इस जग की पीड़ाएं मन में उठती हैं।
सकल हृदय की अवगुंठन में वे आपस में ही गुथती हैं।
कैसे होता है छल जग में कैसे पूछें इक निश्छल से।

मृत्यु है तृप्ति जीवन की,जीवन है अतृप्त पिपासा।
पल-प्रतिपल बढ़ती जाती हैं मानव जीवन की अभिलाषा।
ऐसा कौन मनुज इस जग में जिसने दुःख को न पाया हो।
कौन है जो सुख तो लाया हो पर पीड़ाएं न लाया हो।
कहां रही है दूर सफलता मानव इच्छा के भुजबल से।

Friday, March 14, 2008

मुम्बई की सड़कें

कभी देख कर इतने पापों को होते
वो है कौन जिसकी भुजाएं न फड़के
न जाने हैं क्यों मौन मुम्बई की सड़कें

न बदलीं कभी ये बदलते समय में
गम में, खुशी में, पराजय में, जय में
देखा इन्होने सदियाँ बदलते
ज़मीन पर चमकते सितारों को चलते
देखे कई इनने बम के धमाके देखे ,
देखे इन्होंने इंसान पिघलते
फ़िर भी कभी कुछ भी बोलीं नहीं ये,
सिसकतीं रहीं अपने अन्तरह्रदय में

जलाया इन्हें गर्मियों में खुदा ने
डुबाया इन्हें बेदर्द आसमाँ ने
मगर ये यूं ही बस चली जा रहीं हैं,
कई बार छोडा इन्हें कारवां ने
कभी ये हंसी हैं बिछड़ते हुए भी,
कभी ये हैं रोईं अन्तः प्रणय में

देखा खुले आम जिस्मों को बिकते
कड़ी धूप में आम इंसान को सिकते
सदा आदमी इनने भागते ही देखा,
न देखा इन्होने किसी को भी टिकते
झूमीन हैं ये अलमस्त उत्सवों में,
जलीं हैं स्वयं ये धधकते प्रलय में

Thursday, February 7, 2008

काश..........

काश गर मैं जान पाता,
मुस्कान के पीछे छिपी तेरी व्यथा को,
तो तोड़ देता हर एक बंधन हर प्रथा को,
अंतर्हृदय मैं घाव जो तुमने छिपाए,
आंख में आंसू लिए तुम मुस्कुराए,
मैं रोक देता समय की अविरत गति को,
अप्ने प्रेम के आगे झुकाता संसृति को,
तेरे आंसुओं को सीप के मोती बनाता,
तेरे जीवन को खुशियों से सजाता,
काश गर मैं जान जाता।

Tuesday, January 1, 2008

नए वर्ष का नया सवेरा

नए वर्ष का नया सवेरा तेरे नाम।
साल का पहला गीत ये मेरा तेरे नाम।

सूरज की किरणों का मीठा सा चुम्बन।
सर्दी की मीठी धूप का मीठी आलिंगन।
तेरे लिए लाया है प्यार का एक पैगाम।

सुबह उठ कर ली जो तूने अंगड़ाई।
छूकर के तुझको महकी ये पुरवाई।
सर्वप्रथम सूरज ने तुझको किया प्रणाम।

तेरी सांसों ने सौरभ महकाए।
अलि तेरे ही गीतों को हर दम गाए।
तुझ पर न्योछावर जीवन की सारी शाम।

है दुआ मेरी तेरा दामन खुशियों से भर दे।
यह नया वर्ष तेरे जीवन को हर्षित कर दे।
बस इतना कह कर करता हूं मैं पूर्णविराम।

Sunday, December 30, 2007

स्वतंत्रता

हम जब भी अपनी
भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
तो अंतर्मन में कहीं
अपने आप से ही डरते हैं।
(दावा करते हैं)
भावनाओं को शब्दों को सींखचों
में कैद कर लेने का।
समस्त सागर को
अंजुली में भर लेने का।
हर दिन, हर पल, हर क्षण
वैचारिक परतंत्रता का ज़हर पिया करते हैं।
और यह सोच कर खुश होते हैं
कि हम स्वतंत्रता से जिया करते हैं।

Saturday, December 29, 2007

कवितावतरण

अंधेरों में निराशा के.
किरण हो एक आशा की.
पकड़ कर डोर भाषा की.
जो हो जाते हैं स्वर मुखरित,
तो फ़िर बेदी से भावों की,
निकल पड़ती है एक गीता,
अवतरित होती है कविता

Thursday, December 27, 2007

अस्थिर-स्थिर

चलती रही हवा
चलती रही धरा
चलता रहा गगन
चलता रहा मन
चलता रहा जीवन
बस मैं थम गया

Thursday, November 22, 2007

नव प्रभात

सूरज की किरणों को छूकर आज हुआ स्वर्णिम सागर जल।
उगते सूरज की लाली से लाल हुआ अम्बर का आंचल।

चिड़ियों की मधुरिम बोली ने मौसम में मिठास एक घोली।
नए दिवस का स्वागत करने दिशाओं ने बाहें खोलीं।

खत्म हुआ अब तम धरती से खत्म हो गई रात।
नवजीवन का नव सन्देश ले आई नई प्रभात।

Saturday, November 3, 2007

.......... बोल गई

एक दिन हमारी कक्षा में एक लड़की आई।
उसे देख कर दिल में प्यार की घंटी टनटनाई
तो मैने निश्चय किया,
अब तो जीना है या मरना है।
लेकिन उससे अपने,
प्यार का इज़हार ज़रूर करना है।
तभी मुझे एक विज्ञापन याद आया।
जिसमें था रवीना ने गाया।
लिखते-लिखते लव हो जाए।
तो मैने सोचा हो सकता है,
इस पेन से मेरी किस्मत जग जाए।
तो मैं भागा और वह पेन खरीद कर लाया।
फिर उसे पूरे दिलोजान से सजाया।
और मौका देख कर वह पेन,
उसके बैग में घुसाया।
वह आई, जैसे ही पेन निकालना चाहा,
हाँथों मे मेरा ही पेन आया।
जैसे ही उसने शुरु की लिखाई,
मेरा मन हर्षाया।
लिखकर दो लाईनें उसने मुझे देखा,
और मंद-मंद मुस्काया।
उसे हंसता देख मुझे
हँसी तो फँसी वाला फंडा याद आया।
पीरियड खत्म हुआ वह एक बार फिर मुस्काई।
फिर धीरे-धीरे चलकर मेरे पास आई।
उसे आता देख सर से पाँव तक पसीने छूट गए।
मन में हज़ारों-लाखों लड्डू फूट गए।
उसने आकर कहा यह पेन आपने दिया?
मैने कह हाँ आपको गिफ्ट किया।
उसने फिर कुछ सोचा और बोली,
यू लव मी,डू यू?
मेरे कुछ बोलने से पहले उसने कहा,
आई लव यू टू।
और पेन के लिए भैया व्हेरी-व्हेरी थैंक यू।
उस दिन दिल पर ऐसी गाज़ गिरी कि मेरी
आत्मा डोल गई।
लड़की गई सो गई मगर जाते-जाते
भैया बोल गई।

Saturday, October 27, 2007

कभी जो सामने आओ

कभी जो सामने आओ तो ये पूछें तुमसे।
क्यों ज़िक्र आते हि मेरा हो तुम यूं गुम-सुम से।
क्या बात हुई कि तुमने मेरा दिल तोड़ दिया।
ये किसके कहने पर दामन को मेरे छोड़ दिया।
क्यों बिछड़ने के बाद तन्हाई का यह आलम है।
क्यों हैं ज़िन्दगी में पतझड़ के ये मौसम से।
कभी जो सामने आओ तो ये पूछे तुमसे।

क्यों रात भर मेरी आँखों में नींद न आई एक पल।
क्यों हर घड़ी दिल में मची है एक हलचल।
चले गए यूं दूर तुम एक बार तो सोचा होता,
शिकवा हुआ जो तुमको एक बार न कहा हमसे।
कभी जो सामने आओ तो ये पूछें तुमसे।

Thursday, October 18, 2007

झण्डे का अपमान

आज हर जगह होता देखो झण्डे का अपमान।
चीर हरण हो रहा उसी का जो है देश की शान।

चोर लुटेरे लूटें दिन में और रखवाले पैसे खाएं।
पहले भरें हम जेबें उनकी फिर फरियाद लिखाने जाएं।
रक्षक-भक्षक हुए यहां पर दोनो एक समान।
आज हर जगह होता देखो..........।

कहाँ चले गए सुभाष चंद्र कहाँ भगत, आज़ाद खो गए।
कैसे हो गया खून ये पानी कहाँ देश के नौजवाँ सो गए।
हो गई है क्या धरा देश की वीरों से वीरान।
आज हर जगह होता देखो............।

इसी के खातिर हुई क्रांति इसी के खातिर हुई लड़ाई।
आज़ादी के परवानों ने स्व-मुण्डों की भेंट चढ़ाई।
इसी के खातिर सीमा पर गोली खाते वीर जवान।
आज हर जगह होता देखो............।

जो हर दम झूठे वादे करते खद्दर जिनकी पहचान।
रिश्ता नहीं किसी से इनका, बस सोना इनका ईमान।
इन्हीं के हाथ की कठपुतली बना गया यह संविधान।
आज हर जगह होता देखो............।

Tuesday, October 16, 2007

भूत-वर्तमान-भविष्य

नीचे थी हरी भरी धरती ऊपर था अंबर विशाल।
देख कर गरिमा पृथ्वी की वृक्ष विहग करते करताल।
इसकी रक्षा करने को थे सौ-सौ बाँके निहाल।
देख कर जिसका रूप सलोना स्तब्ध हुआ करता महाकाल।

जाने फिर क्यों आज बदल गया सबका खयाल।
सामप्रदायिकता और भ्रष्टाचार ने आज फैलाया अपना जाल।
अब है नमुझको बस इसका मलाल।
न नीचे है हरी भरी धरती न ऊपर है अंबर विशाल।

फिर भी मुझको है इतना यकीन आएगा फिर से वो काल।
न तो होगा कोई शक़ न होगा कोई सवाल।
पृथ्वी पर रहने वाला हर प्राणी होगा खुशहाल।
नीचे होगी हरी भरी धरती ऊपर होगा अंबर विशाल।

हास्य रस

एक दिन मुझे भी कविता लिखने का शौक चढ़ा।
तो मैं भी इस पथ पर आगे बढ़ा।
सोचा चलो सौंदर्य रस पर लिखता हूं।
आम लोगों से थोड़ा अलग दिखता हूं।
तो लिखने के लिए मैं दौड़ा-दौड़ा घर आया।
और प्रेरणा के लिए पत्नी को सामने बिठाया।
और कविता लिखनी शुरू की।
एक से बढ़कर एक उपमाएं दीं।
कविता कुछ यूं बनी:-
तेरी घनी ज़ुल्फें जैसे हों घोड़े की पूंछ।
होंठों के ऊपर तेरे हल्की मोटी मूंछ।
आवाज़ तेरी शेरनी जैसी और टमाटर से गाल।
चाल भी तेरी मस्त मस्त है ज्यों हाथी की चाल।
जैसे ही ये लाईनें हमने पत्नी को सुनाईं।
वह हम पर शेरनी सी गुर्राई।
हमने कहा भाग बेटा वर्ना तेरी शामत आई।
भागते-भागते मैं सोच रहा थी कि,
मेरी कविता से ये कैसा जादू चल गया।
मेरा सौंदर्य रस पत्नी के रौद्र रस में कैसे बदल गया।
आँखें बंद कर कर मैं दौड़ा-दौड़ा आया।
आँख खुलने पर अपने को एक मंच पर खड़ा पाया।
और जब मैने अपनी यह व्यथा वहाँ सुनाई।
तो लोगों को बड़ी ज़ोर-ज़ोर से हँसी आई।
और तब मुझे यह समझ में आया।
कि जब भी कोई दुःखी अपना दुःख,
दुनिया को सुनाता है।
तो वह खुद ही दुनिया के लिए,
हास्य रस का एक काव्य बन जाता

Sunday, October 14, 2007

वंस मोर प्लीज़

एक दिन एक लड़की यूं ही चली जा रही थी।
मन ही मन शायद कोई गीत गा रही थी।
तभी अचानक वो एक लड़के से टकराई।
और सम्भलते ही उस लड़के पर गुर्राई।
निर्दोष होने पर भी वह सब कुछ सुनता रहा।
और लड़की से एक शब्द भी नहीं कहा।
लड़की स्थिति भाँप गई कि लड़का शर्मिन्दा है।
वह तो शहर का सीधा सादा सभ्य बाशिन्दा है।
तो स्थिति सुधारने के लिए लड़की ने,
एक के बाद एक व्यंग्य बाण सरकाया।
लड़का कोछ कहे बिना ही,
उन पर मंद-मंद मुस्काया।
लड़की ने फिर कहा आप तो लड़कियों की तरह शरमा रहे हैं।
मैं ही मैं बोले जा रही हूं आप कुछ नही फरमा रहे हैं।
इस पर लड़के के सब्र के बांध टूट गए।
उसके कण्ठ से कुछ स्वर फूट गए।
उसने अपने चेहरे को किया संजीदा,
और हँसी को किया सीज़।
और धीरे से कहा,
मडम वंस मोर प्लीज़।

Saturday, October 13, 2007

कुर्सी ज़िन्दाबाद

यहाँ सभी के दर्शन छोटे और बड़े हैं नाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।
रखते हैं सब बगल में छुरी और अधरों पर राम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

न दुआ चले न दवा चले।
बस आए पैसे की खुश्बू,
जब-जब भी यहाँ पर हवा चले।
यहाँ पैसे से हो हर काम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

कहने को है यह लोकतंत्र।
जो है विकास का मूलमंत्र।
पर इन खद्दर वालों ने,
किया इसका काम तमाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

यहाँ ईमानदारी की छाप हैं डंडे।
अच्छे-अच्छों के बाप हैं डंडे।
यहाँ सब डंडे को करे सलाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

Thursday, October 11, 2007

न जाने क्यों पीत हूँ मैं

न जाने क्यों पीता हूँ मैं?

बाद पीने के दुखाता बोल कर सच दिल सभी का।
ऐसे जीवन से तो अच्छा था कि मर जाता कभी का।
देखने पर हूं बहुत खुश, अन्दर से गम कोई है खाता।
कोई मुझसे हाल पूछे क्या बताता क्या छिपाता।
बाहर से हूँ भरा हुआ अंतर्मन में बहुत रीता हूँ मैं।
न जाने क्यों पीता हूँ मैं?

होंठों पर रहता तबस्सुम आँखों में रहता है पानी।
टूटे अरमाँ, टूटा दिल बस है मेरी इतनी कहानी।
गम के हर इक पल में खुशियाँ ढूंढता जाता हूं मैं।
दर्द बढ़ जाता है जब कविता कोई गाता हूं मैं।
मार कर के अपने मन को ऐसे ही जीता हूं मैं।
न जाने क्यों पीत हूँ मैं?

प्रेम तेरा चुभ रहा मेरे हृदय में शूल बन कर।
मजबूरियाँ मेरी आगे आतीं मेरे दुःखों का मूल बन कर।
टूटता जाता हूं हर पल अपनी हर इक आह पर मैं।
इतना आगे बढ गया हूं ज़िंदगी की राह पर मैं।
किस तरह से लौट आऊं कि समय बीता हूं मैं।
न जाने क्यों पीता हूँ

Friday, October 5, 2007

कल्पना

चाँदनी के रस में नहा कर।
सर्दी की धूप की ओढे चादर।
मेरे हृदय में वो समाई।
जैसे हो वो मेरी परछाई।

खुश्बू उसके बदन की है जैसे,
पहली बारिश की पहली फुहारें।
महक उठा अचानक ये आलम,
छू कर आईं हैं उसको बहारें।

वो हँसे तो बने फूल कलियां,
आँसुओं से बना उसके सागर।
उसकी आँखों में है प्रेम इतना,
दूजा भाव न होता उजागर।

क्षमता अवनी सी उसने है पाई।
बस वही मेरे दिल में समाई।
क्या बताऊँ तुम्हें कि वो क्या है।
वह तो मेरी बस एक कल्पना है।

Tuesday, October 2, 2007

मियाँ मुशर्रफ

क्यों मियाँ मुशर्रफ?
क्या फौज ने बना दिया है आपको
इतना टफ
कि नहीं पड़ता आप पर
कोई असर विरोध का।
लोगों की पसन्द पर,
किए गए शोध का।
क्या आप नहीं समझ पाते,
सेना और लोकतंत्र
के बीच का अंतर।
शासन का मंतर।
सेना है तंत्र बंधन का
और लोकतंत्र है बंधन तंत्र का।
ध्यान रखिए इस मंत्र का।
और राष्ट्रपति बनने की हठ छोड़िए।
क्यों कि नहीं चलती
कोई भी हठ प्रजातंत्र में।
भले हो बालहठ या राजहठ,
नहीं रखतीं अस्तित्व
एक देश स्वतंत्र में।
मैं कहता हूं अब भी समय है,
चेत जाइए।
औरों को सुकूं से खाने दीजिए और
खुद भी खाइए।
यदि आप अपनी कुमति को,
सुमति पर नहीं लाएंगे।
तो आप भी एक दिन भुट्टो की
गति पाएंगे।

रोमन के वकील

दे रहे हैं ज़ोर जो रोमन के उपयोग पर।
वो क्या जानें योग सदा भारी पड़ता है भोग पर।

वो हैं नादाँ जो न जानें मोल मातृभाषा का।
अंत सदा ध्वंस ही होता है अति-अभिलाषा का।
परभाषा की जो करें वकालत वह भी इतना जानें,
निजिभाषा ही है चिर उत्तर मन की तृष्णाशा का।
होते हैं प्रसन्न ये देखो अपने नए प्रयोग पर।
ये क्या जानें योग सदा भारी पड़ता है भोग पर।

जिनका स्वाभिमान नहीं होता वे ऐसा कहते हैं।
ऐसे लोग सदा जीवन की मझधारों में बहते हैं।
इसी तरह के लोग नहीं बढ़ पाते जीवन पथ में,
ये लोग जहां से चलते हैं ताउम्र वहीं रहते हैं।
समझ गई है सारी दुनिया, न समझे ये लोग पर।
ये क्या जानें योग सदा भारी पड़ता है भोग पर।

© Vikas Parihar | vikas