नज़र उठाई धरा पर जिसने आँख फोड़ कर आयेंगे|
गर दुश्मन ने हाँथ उठाया खून की नदी बहाएंगे |
दिल में एक तूफ़ान छिपा है सीना है फौलादी|
हमको अपनी जान से प्यारी है अपनी आज़ादी|
भारत की सेना के हम जवान, हिन्दोस्तान की हम हैं शान|
टाईगर हिल पर किया जब कब्ज़ा दुश्मन ने इतरा के|
पल में दूर खदेडा उसको वो बिखर गया छितरा के|
पैर हमारे नहीं बांधते राखी, कुमकुम, चंदन रोली|
बंदूकों से मने दीवाली और दुश्मन के खून से होली|
अपनी जान की हमें न परवाह, हम ले लें दुश्मन की जान|
भारत की सेना के हम जवान, हिन्दोस्तान की हम हैं शान|
Tuesday, July 1, 2008
हिन्दोस्तान की हम हैं शान
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विकास परिहार
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18:46
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, March 23, 2008
तन्हा रातें
तुम क्या जानो कि कैसे डसती हैं तन्हा रातें।
हम पर हर रोज़ ही हंसती हैं तन्हा रातें।
कौन कहता है कि हर चीज़ यहां महगी है,
यहां तो धूल से भी सस्ती है तन्हा रातें।
दिन तो कट जाते हैं जैसे तैसे,
बन कर के आग बरसतीं हैं तन्हा रातें।
कहीं नहीं है यहां प्यार अम्न की खुश्बू,
डर-औ-दहशत की बस्ती है यहां तन्हा रातें।
लेखक:-
विकास परिहार
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23:50
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, March 16, 2008
हर शाम मेरा ठिकाना बदलता है
रातभर कोई भौंरा मचलता है
तब जाकर फूल कोई खिलता है
तुम्हें क्या मालूम अहमियत भूख की,
एक रोटी के लिए तवा घंटों जलता है
ज़िंदगी क्या है हमसे पूछो,
जब से पैदा हुए हैं- बस चलता है
ख्वाहिशें आदमी की पहुँचने लगीं फलक तक,
हर रोज़ एक तारा कम निकलता है
मुसाफिर हूँ मैं मेरा ठिकाना न पूछ,
हर शाम मेरा ठिकाना बदलता है
लेखक:-
विकास परिहार
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02:32
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Monday, November 19, 2007
उसे सामने लाओ ज़रा
भीड़ से जो है जुदा उसे सामने लाओ ज़रा।
गर कहीं पर है खुदा उसे सामने लाओ ज़रा।
आज फिर खाकर के ठोकर मैं गिरा हूं राह में,
जिसने नहीं दी बद्-दुआ उसे सामने लाओ ज़रा।
यहाँ रहने रहने वाला हर एक शख्श गुनहगार है,
जिसने किया न हो गुनाह उसे सामने लाओ ज़रा।
यहाँ सब मजबूर हैं प्रतिकार भी है एक खता,
है कौन जो बोला यहाँ उसे सामने लाओ ज़रा।
लेखक:-
विकास परिहार
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21:54
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, November 18, 2007
अर्चन
भरे भंवर में फंसा अकेला मन रे।
जाने कैसे तरेगा यह जीवन रे।
जीवन नैया है अब तेरे सहारे।
अब तो इसको तू ही पार लगा रे।
दीनबन्धु मैं दीन तुझे क्या भेंट करूं मैं,
तुझको तो सारा जीवन अर्पण रे।
चहूँ दिशा में दिखते मुझको भाँति-भाँति आडम्बर।
सभी जगह तेरा नाम लिखा है धरती हो या अम्बर।
भावनाएँ मेरी श्रद्धा सुमन हैं हृदय मेरा मंदिर है,
वहीं तुझे स्थापित कर करता तेरा अर्चन रे।
लेखक:-
विकास परिहार
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19:07
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Saturday, November 17, 2007
क्या कहूं किससे कहूं
क्या कहूं किससे कहूं मैं कुछ समझ आता नहीं।
सब दवाएं देख लीं पर दर्द-ए-दिल जाता नहीं।
रह गुज़र में अब तो मैं चुपचाप चलता ही चला,
गीत कैसे गाऊं मैं जब साथ कोई गाता नहीं।
बे वज़ह है आपके इकरार का दिल को यकीं,
मैं भी अपने दिल को अब यार बहलाता नहीं।
जिसको भी है मय की ख्वाहिश जाए वो साकी के दर तक,
पास प्यासे के कभी भी मयकदा आता नहीं।
शब भर करी थी बात जिसने मेरे हमदम की तरह,
सुबह कहता है कि मुझसे उसका कोई नाता नहीं।
प्यार करने वाले अक्सर डूब जाते हैं भंवर मे,
इश्क के दरिया मे कभी साहिल कोई पाता नहीं।
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विकास परिहार
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23:37
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Thursday, November 1, 2007
तुम्हारे वास्ते हैं
तुम्हारे वास्ते हैं मेरे जीवन के धारे।
तुम्हीं हो मेरे साथी तुम्हीं मेरे सहारे।
ये कलियाँ,फूल,भंवरे,ये सूरज चाँद तारे,
तुम्हारे ही लिए हैं यहाँ सारे नज़ारे।
है मुझको प्यार तुमसे तुम्हे कैसे बताऊं,
हो तुम तो मेरे हमदम मुझे जाँ से भी प्यारे।
तुम्हारे बिन तो जैसे सज़ा है मेरा जीना,
तुम्हारे बिन अकेला मैं जाऊंगा कहाँ रे।
बहुत समझाना चाहा मगर फिर भी न माना,
है दिल को तेरी चाहत और हम दिल के मारे।
मुहब्बत के सफर में फंसी है मेरी कश्ती,
मुझे तुम जो मिलो तो मिलें मुझ को किनारे।
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विकास परिहार
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01:37
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Tuesday, October 30, 2007
अजी देखो तुम
अजी देखो तुम यूं न इतराके जाओ।
अपने दीवाने को अब न सताओ।
कभी तो मुझे प्यार से देख लो तुम,
कभी तो मुझे देख कर मुस्कुराओ।
ये माना ज़माना है तेरा दीवाना,
मगर तुमको न कोई मुझ सा मिलेगा।
ये भी माना कि तुमने देखे हज़ारों,
मगर इक दफा तो मुझे आज़माओ।
हवाएँ फिज़ाएं हँसीं ये नज़ारे।
सभी तो हैं महके करम से तुम्हारे।
मेरा भी जीवन महकने लगेगा,
दिलबर मुझे तुम जो अपना बनाओ।
निगाहों में उसकी वो खंज़र छिपे हैं,
कि बचना जो चाहो तो बच न सकोगे,
मुझे भि बनाया है उनने निशाना,
मौला मुझे उस कहर से बचाओ।
लेखक:-
विकास परिहार
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12:36
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, October 28, 2007
प्रेम-विनय
काहे तड़पाए मोहे ओ साँवरे।
प्रीत में तेरी नैना भए बावरे।
जब भी जिधर भी देखूं तू ही दे दिखाई।
मैं बन गई हूं मीरा तू मेरा कन्हाई।
तू मोहे लेके चल अब अपने गाँव रे।
हर पल तुझे पाने की है अभिलाषा।
प्रेम सुधा बरसा दे मन मेरा प्यासा।
नहीं मिलता चैना मोहे किसी ठाँव रे।
रातभर मोरे नयनन में निंदिया न आए।
दिनभर रहे मोरे नयना भरमाए।
मोहे अपना ले कर दे मो पे छाँव रे।
लम्बी डगर है ओ मोरे सैयाँ।
आकर थाम ले तू मोरी बैयाँ।
दे-दे सहारा थक गए मोरे पाँव रे।
लेखक:-
विकास परिहार
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22:48
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Friday, October 26, 2007
क्या वो भूल पायेंगे
वो कह रहे हैं मुझसे कि मुझको भूल जाओ,
कोई उनसेजा कर पूछे कि क्या वो भूल पाएंगे।
जब भी धड़केगा दिल उनका उनके सीने में,
हर एक धड़कन पर उन्हें हम याद आ ही जाएंगे।
जब भी देखेंगे वो खुद को अपने ख्वाबों में,
उस घड़ी उनको याद आएगा मेरा चेहरा,
लहू बन कर बहेंगे रगों में हम उनकी, और
बन रंग उनका चहरे पर उनके छाएंगे।
झुका दे जो खुदा को है वो ताक़त मेरी मुहब्बत में,
उनकी आब-ओ-हवा अपना प्यार मिलाऊंगा ऐसे कि,
रोकना चाहेंगे न रोक पाएंगे अपने कदमों को,
है सच्चा इश्क़ तो इक दिन वो मेरे पास आ ही जाएंगे।
लेखक:-
विकास परिहार
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18:50
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Thursday, October 25, 2007
तेरी इस दुनिया में भगवन
तेरी इस दुनिय में भग्वन इंसान की हालत खस्ता है।
इंसानो की हालत देख कर आज इंसान ही हंसता है।
आज यह इतना आम है कि कोई भी लगा ले मोल इसका,
अर्थ की इस दुनिया में दाम इंसान का इतना सस्ता है।
मैने देखा एक रास्ते पर न कोई अब जाता है,
कांटों से जो भरा हुआ है सच्चाई का रस्ता है।
आज मुझे दे कर के यहां गया अभी एक भेंट कोई,
खोल कर देखा तो पाया वो कांटों का गुलदस्ता है।
औरों की मदद को जुगत लगाई जिसने भी इस दुनिया में,
मैने देखा इस कीचड़ में वो खुद आकर फंसता है।
गर तेरा वज़ूद है सच्चा, मैं आह्वाहन तेरा करता हूं,
फिर से ला दे राम राज्य जो तू दुनिया में बसता है।
लेखक:-
विकास परिहार
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00:36
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Tuesday, October 23, 2007
मैं चला आऊँगा
जब भी तुम्से सभी दूर जाने लगें।
शाम भी अपना दामन चुराने लगे।
तुम मुझे याद करना मेरी जाने जाँ,
मैं चला आऊँगा, मैं चला आऊँगा।
साथी जो थे पथ में छूटें सभी।
सपने सुहाने भी टूटें सभी।
तुम मुझे याद करना.....
आँखों से मोती यूं बरबस टपकने लगें।
पाँव भी चलते-चलते थकने लगें।
तुम मुझे याद करना.....
धड़कनें जाएं रुक नब्ज़ जमने लगे।
कुछ समझ आए न साँस थमने लगे।
तुम मुझे याद करना.....
लेखक:-
विकास परिहार
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14:39
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, October 21, 2007
एक रोज़
एक रोज़ सनम हम यह तुमको बतलाएंगे।
चाहा है बस तुम्को, तुमको ही चाहेंगे।
चाहे जग दुत्कारे, या पत्थर से मारे।
चाहे रात कटे अपनी गिन-गिन कर के तारे।
पर राहे वफा पर हम चलते ही जाएंगे।
तू साथ नहीं मेरे नहीं मुझको कोई गम।
पर इतना यकीं तो है तुझको पाएंगे हम।
दिल में तेरे एक दिन हम जगह बनाएंगे।
तुझे प्यार का हम अपने एहसास दिलाएंगे।
पत्थर के दिल मे भी हम प्यार जगाएंगे।
जीते हैं सभी पर हम मरकर दिखलाएंगे।
लेखक:-
विकास परिहार
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13:25
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Saturday, October 20, 2007
ज़िन्दगी से मेरा करीब का नाता है
ज़िन्दगी से मेरा करीब का नाता है।
अब भी तेरा हंसता चेहरा मुझे याद आता है।
है झनक तेरी बोली में ऐसी,
जैसे कोई साज़ गुनगुनाता है।
गम तो हैं नैमतें खुदाई की,
इनको क्यों यह जहाँ भुलाता है।
कौन सुनता है दुःख को गैरों के,
कौन अपनों को आज़माता है।
यह तो मिलते ही हैं मुहब्बत में,
ज़ख्म तू क्यों भला छिपाता है।
उसका अल्हड़ हसीन सा चेहरा,
अब भी हमें देख मुस्कुराता है।
मेरे गम की उदास बस्ती में,
मौत का भी दिल पसीज जाता है।
लेखक:-
विकास परिहार
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00:41
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Thursday, October 18, 2007
शाम के जाते-जाते
फिर से तेरी याद आई शाम के जाते-जाते।
फिर खाली हुए जाम मेरे शाम के जाते-जाते।
सहर से नाम की मैने तेरे इबादत की,
फिर लब पे आया नाम तेरा शाम के जाते-जाते।
जिस किसी गली से तू एक बार जो गुज़री,
मच गया कोहराम वहाँ शाम के जाते-जाते।
लोगों ने तेरे हुस्न की तारीफ जो करनी चाही,
लिखे गए कलाम कई शाम के जाते-जाते।
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विकास परिहार
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14:01
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Sunday, October 14, 2007
निभाती क्यों हो
जो मुझसे दूर ही जाना है तो फिर पास बुलाती क्यों हो।
गर झुकाना ही है नज़रों को तो नज़रों को मिलाती क्यों हो।
छिपाकर के जो किया हो वो हर काम गलत है,
अगर है पाक मुहब्बत तो ज़माने से छिपाती क्यों हो।
अगर है प्यार मुझसे तो ज़माने से न डरो तुम,
और गर डर है ज़माने का तो फिर प्यार जताती क्यों हो।
माना हर किसी को खुश रखना आसाँ नही होता,
पर अगर इतना ही मुश्किल है निभाना तो निभाती क्यों हो।
तुम्हें मालूम है दिल का और ख्वाबों का नाता पुराना है,
जो न हो सके पूरा कभी वो ख्वाब दिखाती क्यों हो।
बता देते हैं तेरी रात का आलम तेरे अश्कों के निशाँ,
बेवजह अश्कों को अपने चेहरे पर सुखाती क्यों हो।
जो टूट जाएं वक़्त की बस एक चोट से,
ऐ सनम रेत के ऐसे घरोंदों को बनाती क्यों हो।
लेखक:-
विकास परिहार
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20:33
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Friday, October 12, 2007
याद करो
देश वासियो याद करो तुम उन महान बलिदानों को।
देश के खातिर जान लुटाई, देश की उन संतानों को।
जिनके कारण तान कर छाती खड़ा यह पर्वतराज है।
जिनके चलते सबके सर पर आज़ादी का ताज है।
महाकाल भी काँपा जिनसे मौत के उन परवानों को।
देश वासियो याद करो................
देख कर टोली देव भी बोले देखो-देखो वीर चले।
गर पर्वत भी आया आगे, पर्वत को वो चीर चले।
जिनसे दुश्मन डर कर भागे ऐसे वीर जवानो को।
देश वासियो याद करो................
जिनने मौत का गीत बजाया अपनी साँसों की तानो पर।
पानी फेरा सदा जिन्होंने दुश्मन के अरमानों पर।
मेहनत से जिनने महल बनाया उजड़े हुए वीरानों को।
देश वासियो याद करो................
हँस-हँस कर के झेली गोली जिनने अपने सीनों पर।
अंत समय में सो गए जो रख कर माथा संगीनों पर।
शत-शत नमन कर रहा है मन मेरा ऐसे दीवानों को।
देश वासियो याद करो.................
लेखक:-
विकास परिहार
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00:16
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Tuesday, October 9, 2007
जब कि दुनिया
जब कि दुनिया व्यस्त है नवकाल के निर्माण में।
हम अभि भी खोजते भगवान को पाषाण में।
संगणक का युग है यह, है सदी इक्कीसवीं,
फर्क अब भी खोजते हम राम में रहमान में।
ईर्ष्या और द्वेष से भरपूर हर इक क्षेत्र है,
आदमी अब तक बदल पाया नहीं इंसान में।
मुस्करा कर जा रहे हो आज जो तुम इस जगह से,
आओगे इक दिन सुनो तुम भी इसी शमशान में।
लेखक:-
विकास परिहार
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23:14
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
धीरे-धीरे
वक़्त के साथ बढ़ रहे हैं उम्र के साल भी धीरे-धीरे।
कि देखो पकने लगे हैं मेरे बाल भी धीरे-धीरे।
पहले हर रोज़ मुझे ख्वाब तेरे आते थे,
अब तो आते नहीं ख्याल भी धीरे-धीरे।
पहले दिल अपना लगाने से जिन्हें नफरत थी,
आज बिछाते हैं दिल के जाल वो धीरे-धीरे।
पहले जो बे-झिझक मुझसे बात किया करते थे,
आज पूछते हैं मेरा हाल वो धीरे-धीरे।
लेखक:-
विकास परिहार
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01:31
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एक बार जो बिछड़े
एक बार जो बिछड़े कहाँ वो लोग मिलते हैं।
यह गुल तो वो गुल हैं जो पतझड़ ही में खिलते हैं।
मेरी मुहब्बत से झुक जाएगा न वो क्यूं कर,
जब डोलती है धरती तब पर्वत भी तो हिलते हैं।
जब से है यह दिल टूटा, अहसास हुआ मुश्किल,
अब आँखें भी न होतीं नम जब घाव सिलते हैं।
यह शमा क्या जाने परवाने की मुहब्बत को,
जो उससे इश्क कर कर उससे ही जलते हैं।
लेखक:-
विकास परिहार
at
01:25
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