जब मुंबई में था तब गाहे बगाहे जहाँगीर अर्ट गेलरी या नेशनल गेलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में जा कर अपनी कला की भूख को शांत कर लेता था। परंतु जब से जबलपुर आया हूं ना तो कोई अच्छी पेंटिंग ही देख पाया हूं और न ही कोई अच्छा नाटक। पर कल अंतरजाल पर घूमते घूमते अचानक तूलिका आर्ट गेलरी के जाल पृष्ठ पर जा पहुंचा। वहां उड़ीसा के जाने-माने चित्रकार कुमुद दास की कुछ पेंटिंग्स देखीं। कुमुद जी की इन सत्रह पेंटिंग्स ने मानो बुद्ध के संपूर्ण दर्शन को ही रंगों मे उकेर दिया हो।
बौद्ध दर्शन पर आधारित ये पेंटिंग्स जैसे जीती सी प्रतीत हो रही थीं ऐसा लग रहा था कि जैसे अभी कोई पेंटिग उठेगी और कम्प्यूटर से निकल कर बोलेगी कि ऐसे क्या देख रहे हो मैं तो शांति के रूप मे सदैव से तुम्हारे अन्दर हूं। इन पेंटिंग्स को छोड़ कर तुम अपने अन्दर ही क्यों इतने ध्यान से नहीं देख लेते। उनकी हर पेंटिंग मे बुद्ध की करुणा, उनकी शांति, उनका मौन बड़े ही स्वभाविक ढंग से उभर कर आ रहा था। उनके चेहरे की वो निर्मल मुस्कान जैसे कह रही हो कि क्यों इतना कठिन होने की कोशिश कर रहे हो, ज़रा सरल और स्वभाविक बन कर देखो कि कितना आनन्द है सरलता में।
कुमुद जी की इन पेंटिंग्स की प्रतीकात्मकता भी जैसे चरम पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। कुमुद जी ने अपनी हर पेंटिंग में शांति, शक्ति,प्रेम,हिंसा आदि के प्रतीकों के रूप में शेर, फाख्ता, हाथी,और कमल का उपयोग किया है। हर प्रतीक अपने साथ सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा लिये हुए है और उनकी पुनरावृत्ति प्रतीक है उस गुण विशेष की तीव्रता का।
काँसे के बने बुद्ध है वर्तमान का प्रतीक। उनकी इन पेंटिंग्स मे एक बात और बहुत खास है और वो है एक तीसरा नेत्र। यहाँ दी गई हर पेंटिंग मे एक तीसरा नेत्र उपस्थित है जो सीधा हमारी आँखों मे देखता सा प्रतीत होता है जो हमेशा सर्वशक्तिमान के होने का एहसास भी दिलाती हैं और प्रतीक भी। ऐसे ही कई छोटे और बडे प्रतीको का संगम है कुमुद जी की इन पेंटिंग्स में। जिन्हे देखना बुद्ध के मौन का आस्वादन करने जैसा ही है भले ही कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ही क्यों न हो।
Thursday, October 4, 2007
बुद्ध के मौन का संवाद
लेखक:-
विकास परिहार
at
16:21
1 टिप्पणियां
Saturday, September 15, 2007
हेनरिक इब्सन का मास्टर बिल्डर
सफ़लता के चरम पर एक इन्सान अपने आप को कितना असुरक्षित महसूस करता है हेनरिक इब्सन का नाटक मास्टर बिल्डर इसी बात को बयान करता है। नोर्वे में जन्मे इब्सन को शेक्सपियर के बाद दूसरा महानतम नाटककार माना जाता है। उनके द्वारा लिखा गया यह नाटक एक ऐसे इन्सान की कहानी है जो अपने दिमाग़, मेहनत और लगन के बल पर आपने आप को एक सफ़ल व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करता है। हालांकि अपने को इस स्तर पर लाने के लिये वह अपने व्यक्तिगत जीवन एवं सुखों को दांव पर लगा देता है। यहां तक कि जिस व्यक्ति के यहां से वह अपनी शुरुआत करता है बाद में उसी की जङें काट देता है। इस कहानी का मुख्य पात्र मास्टर बिल्डर यह जानता है कि उसने यह गलत किया है और यही अपराधबोध उसे अंदर हि अंदर खाता जाता है और उसे भयभीत करता जाता है कि जैसा उसने किया वैसा उसके साथ भी कोई कर सकता है। इसीलिये वह हमेशा युवा पीढी से डरा हुआ सा रहता है। युवा पीढी हमेशा उसे उसकी असुरक्षा का अनुभव कराती रहती है। जहां एक ओर इब्सन सफ़लता के चरम पर पहुंचे इंसान के अंर्तद्वंदो एवं अंर्तमन की गहराइयों को मथने की कोशिश करते हैं वहीं दूसरी ओर इस नाटक में दो स्त्री पात्रों के माध्यम से इब्सन ने दो अलग-अलग मानसिकताओं का चित्रण किया है। एक ओर है मस्टर बिल्डर सोलोनेस की पत्नी आलीने सोलोनेस और दूसरी ओर है हिल्दे वांगेल। जहां एक ओर हिल्दे वांगेल एक ऐसी युवा पीढी का प्रतिनिधित्व करती है जो अपना अधिकतर समय स्वप्न और रोमांच में ही बिताने का प्रयास करती है वहीं दूसरी ओर है आलीने सोलोनेस जो इस सोच का प्रतिनिधित्व करती है कि दुनिया की बङी से बङी क्षति भी इतनी बङी नहीं हो सकती कि उसके आगे जीवन ही छोटा पङ जाये। वह एक भयंकर हादसे में लगभग अपना सब कुछ खो जाने के बाद जिये जा रहे जीवन की एक गरिमामय झलक प्रस्तुत करती है। यह हादसा भी एक तरह से उसके पति की महत्वाकांक्षा की बदौलत ही घटता है और एक ही झतके में उसका सब कुछ छीन लेता है। आलीने सोलोनेस के ही शब्दों में वह सिर्फ़ इसीलिये जी रही है क्यों कि यह उसका “फ़र्ज़” है। इस नाटक में प्रेम का एक विचित्र एवं अलग ही रूप देखने को मिलता है चाहे वह मास्टर बिल्डर सोलोनेस हो या आलीने सोलोनेस या फ़िर हिल्दे वांगेल का हो या फ़ोस्ली इंगनार या फ़िर क्नूत ब्रोदिक का।
शायद यह नाटक आज के इस भौतिकवादी युग में लोगों को प्रेरित कर सके कि “ईश्वर के लिये गिरिजाघर बनाने से ज़्यादा सार्थकता आम लोगों के लिये घर बनाने में है।”
लेखक:-
विकास परिहार
at
00:57
0
टिप्पणियां
श्रेणी:- समीक्षाएं