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Thursday, September 25, 2008

फैशन शो

हाल ही में मुझे एक फैशन शो देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा लगा जैसे जीते जी स्वर्ग में पहुंच गया हूं। पुलपिट (रेम्प) पर एक के बाद एक मेनका, रम्भा, उर्वशी आदि आदि आतीं जातीं और अपने मुख पर एक यंत्रवत मुस्कान आसपास खड़े लोगों पर बिखेर कर एवं अपने कुछ खास अंग प्रत्यंगों को एक खास तरीके से दिखा कर वापस जा रही थीं। इन सुन्दरियों के साथ आज के ज़माने के भीम और हनुमान भी आते थे और अपना शरीर शौष्ठव दिखाते थे बस अंतर इतना था कि तब के भीम और हनुमान में देशी अखाड़े की दम होती थी और आज के भीम और हनुमान में जिम की दिखावट। ये लोग बाहर से उस चमचमाती हुई बिल्डिंग की तरह दिखाई दे रहे थे जो अन्दर से एक दम खंडहर हो गई हो। और सुन्दर बालाओं के साथ आते हुए ये वीर पुरुष कम और पुराने ज़माने के हरमों और रनिवासों के रखवाले ज़्यादा लग रहे थे।
परंतु इन फैशन शोज़ की सबसे खास बात यह है कि जो काम आज तक कोई सरकार नही कर सकी वो यह फैशन शोज़ कर देते हैं और वो यह कि ये स्त्री और पुरुष दोनो को समान बना देते हैं। हमारी कई सरकारें न जाने पिछले कितने दशकों से स्त्री को पुरुष के समान दर्जा दिलाने की कोशिश कर रही है परंतु वह हमेशा असफल ही रही है। परंतु ये फैशन शोज़ एक झटके में यह कर देते हैं। मेरा देश की समस्त अस्थाई और स्थाई सरकारों को सुझाव है कि समस्त भारत वर्ष को एक रेम्प बना दिया जाये। ऐसा करने से कम से कम लैंगिक मतभेद तो समाप्त हो ही जायेंगे।
इस फैशन शो को देखने के बाद मेरे मन में न जाने क्यों आध्यात्म बोध बहुत अधिक हो गया। जहां एक ओर रेम्प की सभी लड़कियां मुझे अप्सराएं और लड़के भीम और हनुमान की पीढ़ी प्रतीत हो रहे थे वहीं दर्शकदीर्घा में खड़े सभी लड़के मुझे कृष्ण प्रतीत होने लगे। बस कालंतर में कृष्ण में कुछ बदलाव आ गये लगता था। द्वापर में कृष्ण मुरली बजाते थे आज कलयुग के ये कृष्ण सीटी बजा रहे थे। द्वापर में सभी घरों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं होती थी तो गोपियां यमुना स्नान करती थीं और कृष्ण उनके वस्त्र चुरा लेते थे। परंतु आज सरकार ने सभी घरों मे शौचालय निर्माण अनिवार्य करा कर गोपियों का नदियों में नहाना बन्द करवा दिया तो आजकल के आधुनिक कृष्ण गोपियों के वस्त्र नहीं चुरा पा रहे। परंतु गोपियों ने उनकी इस समस्या को समझते हुए वस्त्र पहनना ही कम कर दिया तो अब वस्त्र चुराने का झंझट ही खत्म हो गया। आखिर को-ऑपरेशन से ही तो दुनिया चलती है।
इस रेम्प पर देश के भावी भविष्य को ऐसे बिल्ली की चाल (केट वॉक) चलता देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि हमारी संस्कृति किसी चूहे की भांति बैठी है और इन नौनिहालों के रूप में पाश्चात्य संस्कृति रूपी बिल्ली दबे पांव इसे चबाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ऐसे फैशन शोज़ में इतने तामझाम के बाद चुने जाते हैं दो विजेता जिन्हें मिस्टर और मिस की उपाधि से नवाज़ा जाता है। जैसे बाकी सभी जो मिस या मिस्टर नहीं बन पाए वे स्त्री और पुरुष के बर्गीकरण में न आकर किन्नरों की श्रेणी में आते हैं। द्वापर में द्रोपदी का चीर हरण हुआ था और सभी गणमान्य व्यक्ति हाथ पर हाथ धरे आंखें फाड़ फाड़ कर उस दृश्य को देख रहे थे और आज सभ्यता और संस्कृति का चीर हरण हो रहा है और सभी तथाकथित गणमान्य व्यक्ति हाथ पर हाथ धरे आंखें फाड़ फाड़ कर उसे देख रहे हैं। लगा जैसे इन लोगों को नपुंसकों की श्रेणी में रख कर शायद नपुंसकों का अपमान कर रहा हूं।

Friday, September 19, 2008

स्त्री और पुरुष

कोई पुरुष किसी स्त्री की कमज़ोरी होता है इस बात के तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते परंतु स्त्री हर पुरुष की कमज़ोरी होती है यह बात तय है। इसीलिए चाहे कितना भी बड़ा योगी क्यों न हो उसकी तपस्या हमेशा भंग हुई है और उस तप-भंग के पीछे किसी न किसी स्त्री का ही हाथ रहा है। आज तक किसी स्त्री के तप भंग की कोई घटना का उल्लेख नहीं पाया गया और यदि पाया भी गया तो उसके पीछे किसी पुरुष का हाथ नही रहा। एक समय पर स्थितियां इतनी बिगड़ गयी थीं कि कई योगियों ने तो सिर्फ भोग की लालसा में ही योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाया था। तब तंग आकर ईश्वर को अपना यह तप भंग करने का प्लान और तरीका बदलना पड़ा।
परंतु पुरुष का स्त्री देह के लिए चिरस्थाई कौतूहल अभी तक वैसा ही है जैसा कि आदि काल मे था। अभी कुछ दिनो पहले हमारे कार्यालय मे एक लड़की साक्षात्कार देने के लिए आई। उसके वस्त्रों को देख कर ही लग गया कि वह साक्षात्कार के लिए आई है। उसकी सुगढ़ देह के सारे अंग प्रत्यंग मानो उसके वस्त्रों की सीमाओं को लांघ कर बाहर आने को लालायित हों। ऐसा लग रहा था कि उसके अंग प्रत्यंगों ने उसके वस्त्रों की सरकार के खिलाफ ज़िहाद छेड़ रखा हो। हमारे कार्यालय के सभी लड़को की भावनाएं उस लड़की को देख कर मृगछौने की तरह कुलांचें मारने लगीं। सभी लोग अपनी-अपनी कुर्सियों से उठ कर उसकी तरफ ऐसी कातर निगाहों से देखने लगे जैसे कि एक भूखा कुत्ता किसी भोजन कर रहे व्यक्ति की तरफ देखता है। वह जिस रूम मे बैठ कर अपना इंटरव्यू दे रही थी उसी तरफ हम लोगों के ऑफिस का टॉयलेट भी था। अब हमारे ऑफिस के सभी लड़को का बारी बारी से उस तरफ जाने का सिलसिला शुरू हो गया। और मैं इस सोच में पड़ गया कि उस सुन्दरी ने अपने मदभरे नयनों से ऐसा कौन सा रस पिलाया है कि इन लोगों का यह सिलसिला थम ही नहीं रहा है। उस लड़की को देखते ही मानव विज्ञान के सारे नियमों को तोड़ कर इन लड़कों की किडनियां भी पुरुष प्रवृति के अनुरूप बेहद अप्रत्याशित ढ़ंग से व्यवहार करने लगीं थी। अब मुझे यह समझ आ रहा था कि हमारे गांव के रामदीन काका अपनी भदेस भाषा मे हमेशा यह क्यों कहते थे कि “औरत जब अपनी पर आती है तो अच्छे-अच्छे का मूत निकाल देती है।“
वह लड़की भी ऑफिस के सभी लड़कों की यह हरकतें देख रही थी। उस समय वह अपने को किसी विश्व सुन्दरी से कम नहीं समझ रही थी। और लड़के यह सोच रहे थे कि काश इसकी शर्ट का एक बटन और खुला होता या फिर जींस ही थोड़ा और लो वेस्ट होती हालांकि उससे ज़्यादा लो वेस्ट का मतलब फिर लो हिप्स हो जाता। अपना इंटरव्यू देकर वह लड़की जब बाहर निकली तब सभी लड़के उसे ऐसी कातर निगाहों से देख रहे थे जैसे कि मन्दिर या सड़को पर भीख मांगने वाले बड़ी-बड़ी कार वालो को कुछ पाने की लालसा में देखा करते हैं। वह लड़की भी जाते जाते उन सभी के अरमानों पर पानी फेरती हुई अपनी निगाहों में ठीक वैसी ही हीनदृष्टि डालती हुई चली गई जैसी कि बड़ी-बड़ी गाड़ी वाले तथाकथित बड़े लोग भिखारियों पर डालते हुए चले जाते हैं।
हमारे देश में हमेशा अक्षमता हीनता का पर्याय रही है और स्त्री देह के आगे तो अच्छे से अच्छा और सक्षम से सक्षम व्यक्ति भी हीन और अक्षम हो जाता है। परंतु अपने ऑफिस के लड़कों का यह हाल देख कर मुझे अनायास ही गोर्की की एक कहानी “26 मेन एंड ए वूमन” याद आ गई जिसमें 26 मजदूर एक पिंजरेनुमा डबलरोटी के कारखाने में काम करते थे। जहां उनकी हालत किसी सुअर से भी बदतर थी। उनके लिए ज़िन्दगी का सबसे सुखद क्षण मात्र वही होता था जब मालिक की जवान लड़की वहां से निकलती थी। वे सभी उसे सींखचों से देखा करते और मन ही मन प्रसन्न हो कर तृप्तता का अनुभव करते। उनके जीवन के रेगिस्तान में इस लड़की के दर्शनों के रूप में ही थोड़ी सी हरियाली आती थी। वे सभी उसे किसी देवी की तरह पूजते थे और मन ही मन वे सभी उस से अलग अलग और इकट्ठे प्यार करते थे। एक दिन जब वह लड़की अपने समवर्गी प्रेमी के साथ बाहर निकलती है तो वे सभी आदतन उसे सींखचों से झांक कर देखते हैं। वह लड़की उनकी तरफ एक नज़र देखती है और कहती है – सुअर कहीं के! और अपने समवर्गी प्रेमी के साथ चली जाती है।

Monday, September 1, 2008

आदमी काटने का परहेज़

हमारे देश मे यह प्रथा काफी पुरानी है कि अर्धांगिनी यनि कि धर्मपत्नि रणक्षेत्र में जाने वाले पति को हथियार थमाती है और हर स्त्री, पुरुष की वीरगथाओं को सुन कर अपना हृदय उस पुरुष को दे बैठती है। त्रेता मे भगवति सीता खुद राम को धनुष दे कर आखेट के लिए भेजती थीं। जोधाबाई भी युद्ध के वक़्त अकबर को हथियार अपने हाथों से देती थीं। संयोगिता भी पृथ्वी राज चौहान की वीर गाथाओं को सुन कर ही सर्व प्रथम उन पर मोहित हुई थी। कालांतर में गुण नहीं बदले बस प्रकार बदल गए हैं।
मेरा भी एक मित्र है जो हमेशा कहता रहता है कि “मैं तो आदमी काटने से भी परहेज नहीं करता।” मैं जब भी उसके बारे मे सोचता हूं तो मुझे दुनिया एक सब्ज़ी के बगीचे की तरह नज़र आती है। जहां भांति-भांति की सब्ज़ियां लगी हुई है और मेरा यह मित्र छुरा ले कर उन्हे काटने के लिए बैठा हुआ है। इस समय मुझे गांधी जी अपने इस मित्र के सामने बहुत छोटे और अज्ञानी नज़र आते हैं जो व्यर्थ ही आजीवन लोगों को अहिंसा का पाठ सिखाते रहे। हां तो मैं बात कर रहा था अपने इस मित्र की, तो इसकी एक बहुत अच्छी आदत थी और वो यह कि जब भी कोई बात होती तो यह घुमा फिरा कर उस बात को खत्म अपने इसी डायलॉग से करता कि “मैं तो आदमी काटने से भी परहेज नहीं करता।“ और बात-बात पर अपने शरीर के कुछ घावों को दिखा कर उनको इतना अतिरंजित कर के उनकी कहानी सुनाता जैसे वो घाव किसी गली नुक्कड़ की लड़ाई में नहीं बल्कि कारगिल-युद्ध के दौरान घुसपेठियों को खदेड़ते वक्त उसे उपहार स्वरूप मिले हों। मैं जब भी उसके मुखार्विंद से उसकी वीरगाथाएं एवं वीरता के कारनामे सुनता तो मुझे अपनी भीरुता पर अन्दर ही अन्दर शर्म आने लगती और मैं अपने आप को बेचारे टाइप का महसूस करता।
वहीं उसकी प्रेमिका भी भारतीय सभ्यता का निर्वाह बड़ी सादगी से करती थी। वह भी अपनी सभी सहेलियों को बड़े गर्व से अपने प्रेमी की वीरता के कारनामे बड़े मसालेदार तरीके से सुनाती थी। और इस समय उसकी सभी सहेलियों को उनके डॉक्टर एवं इंजीनियर प्रेमी बड़े ही तुच्छ और निकम्मे लगने लगते। भला वो लड़के भी कोई लड़के हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में किसी भी तरह की लड़ाई नहीं की और जिनके शरीर पर किसी तरह के मार-पीट के चिन्ह न हों। ऐसे ही उसकी एक सहेली का एक प्रेमी मेरे पास बहुत चिंतित हो कर आया और कहने लगा कि “भैया मैं तो बड़ी समस्या में फंस गया हूं। अब आप ही बताइये कि मैं क्या करूं?” मैने उस से बड़ी सहृदयता से पूछा कि “क्या हो गया तुम इतने परेशान क्यों हो?” तो वह बड़ा परेशान हो कर बोलने लगा कि “भैया मेरी गर्लफ्रेंडॅ को पिछले कुछ दिनों से पता नहीं क्या हो गया है वह अब मुझसे हमेशा यह कहती रहती है कि मैने अपनी ज़िन्दगी के 25 वर्ष यूं ही व्यर्थ गंवा दिये। आज तक एक भी लड़ाई नहीं की, किसी के साथ मार-पीट नहीं की, मेरे शरीर पर किसी तरह का कोई निशान नहीं है। और अगर एक हफ्ते के अन्दर मैने किसी से लड़ाई नहीं की तो वह मुझे छोड़ देगी।“ उसकी यह बात सुन कर मेरे सामने सारा किस्सा साफ हो गया। मैने उस से कहा “तो इसमें कौन सी बड़ी बात है अगर तुम्हें अपना प्रेम बचाना है तो भिड़ जाओ किसी से भी।“ तो वह बोला “ऐसे कैसे किसी से भी बिना किसी कारण के भिड़ जाऊं।” तो मैने उसे समझाते हुए कहा कि “ तुम्हे किसने कहा कि किसी से भिड़ने के लिये किसी कारण की आवश्यकता होती है। अब अमेरिका को ही देख लो वह क्या किसी से कारणवश भिड़ता है? और वैसे भी आज कल प्रेम और लड़ाई एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं अब अमेरिका को ही लो वह दूसरे देशों पर हमला करता है क्यों कि वह वहां के लोगों को प्यार करता है। पाकिस्तान काश्मीर मे आतंकवादी भेजता है क्यों कि वह काश्मीर को प्यार करता है। एक भाई दूसरे भाई का गला काटता है क्योंकि वे एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं। इसीलिए आजकल अगर अपने प्रेम को बचाना है तो हिंसा तो करनी ही पड़ेगी। वर्ना तुम्हरी प्रेमिका तुम्हे छोड़ कर चली जायेगी। मेरी बात पता नहीं उसे अच्छी लगी य नहीं पर वह दोबारा मेरे पास नहीं आया।
परंतु मेरा दोस्त और उसकी प्रेमिका जब तब मुझे मिलते रहते हैं। एक दिन मेरे दोस्त के बर्थडे पर मुझे वे दोनो मिल गये। मैंने अपने दोस्त से पूछा “और आज क्या गिफ्ट मे मिल रहा है?” तो मेरे दोस्त ने मुस्कुरा कर कहा कि “देख आज इसने मुझे कितनी प्यारी कटार गिफ्ट की है।” मेरे मन ने यह सुनते ही झट से उस सक्षात देवी को प्रणाम कर लिया जो अपने प्रेमी को उपहार में कटार देती है और मन से आवज़ आई कि धन्य हो देवी तुम्हारे इन श्रीचरणों में इस निकृष्ट प्राणी का शत शत नमन।
ऐसे ही एक दिन वह मुझे अपनी पीठ का एक निशान दिखा कर बोला कि “पता है यह चोट मुझे तब लगी थी जब आमुक बन्दे से मेरी लड़ाई हो गई थी। और पता है तब मेरी उम्र सिर्फ 14 साल थी।“ मुझे लगा कि इतनी खुशी खुद खुदीराम बोस को तब नहीं हुई होगी जब वह फांसी पर लटका था। पर चाहे कुछ भी हो मेरा यह दोस्त है बहुत ही गज़ब जब भी कोई पंगा होता है तो मेरा यह दोस्त छूटते ही कहता है “चल उसे तोड़ कर आते हैं। या चल बहुत हो गया अब उसे फोड़ ही डालते है।“ ऐसा लगता है जैसे यह किसी इंसान को तोड़ने फोड़ने की बात ऐसे करता है जैसे कि वे सभी कोई मिट्टी के पुतले हों। उसका और उसकी प्रेमिका का ज़िंदगी को देखने का नज़रिया एक दम ही अलग है। हुआ यूं कि अक बार मेरे इस दोस्त की गर्दन में हल्की सी मोच आ गई और उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। तो उनकी यह प्रेमिका जो अपने प्रेमी की वीरगाथाओं का बखान करते कभी अघाती नहीं थीं और जो इन्हें कटार सप्रेम भेंट स्वरूप देतीं थी वे मोहतरमा इन्हें अस्पताल में भर्ती करते वक़्त फूट फूट कर रोने लगीं। जब डॉक्टर इन्हें इंजेक्शन लगा रहा था तो इनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह डॉक्टर उनके इंजेक्शन न लगाकर इनके शरीर मे गोली दाग रहा हो। यह सीन देख कर मेरे मुख से अनायास ही निकल पड़ा कि वाह री मेरे भारतवर्ष की आधुनिक युगीन नारी जो देती है भेंट स्वरूप कटारी और बताती है तलवार और फरसों की लड़ाई के किस्से पर डरती है एक इंजेक्शन से। पर इस बात में भी कोई आश्चर्य नहीं है क्यों कि अक्सर ऐसा देखने में आया है कि बड़े बड़े योद्धा छोटी सी छिपकली और कॉक्रोच से डरते हैं। हम लोग अर्जुन महाभारत तो जीत जाता है परंतु अपने अंतर्द्वन्द से लड़ने के लिए उसे भी कृष्ण की आवश्यकता पड़ती है। हम बाहर के दुश्मनों का तो डटकर मुक़ाबला कर लेते हैं परंतु अपने अन्दर के शत्रुओं से लड़ने मे नाकाम हो जाते हैं। सिकन्दर भी विश्व को जीतने की राह पर तो बहुत आगे निकल पड़ा था परंतु स्वयं को जीतने की राह पर एक कदम भी न बढ़ा सका। अंग्रेजों ने दुनिया भर पर कब्ज़ा कर लिया था पर अपनी बुराईयों पर कब्ज़ा नही कर पाये।
मगर मेरा यह दोस्त इन सब से अलग है क्यों कि यह सब्ज़ी काटने में एक बार परहेज़ कर लेता है परंतु आदमी काटने में कतई परहेज़ नहीं करता ये अलग बात है कि आज तक इसे आदमी काटने का कोई एक्सपीरियंस या तजुर्बा नहीं है। और इस से भी अलग है इसकी प्रेमिका जो अपने प्रेमी के गहरे घावों को तो बहुत ही प्रसन्नता से देख लेती है परंतु उसे एक इंजेक्शन लगते नहीं देख सकती। एक बार की बात है दोनो नवदुर्गा महोत्सव देख रहे थे तभी एक मनचला मेरे इस दोस्त की प्रेमिका को छेड़ने के इरादे से कुछ कमेंट कर देता है। प्रेमिका बड़े अरमान ले कर अपने प्रेमी को यह बात बताती है। उसे लगता है कि आज यह अपने प्रेमी के हाथों एक इंसान कटते देख ही लेगी। उसके चेहरे पर वैसी ही खुशी नज़र आती है जैसी किसी बर्थडे पार्टी के वक़्त बच्चों के चेहरे पर केक कटने के पहले नज़र आती है। मेरा यह दोस्त भी बड़े तैश में उस लड़के के पास पहुंचा और पहुंचते ही उसकी मां-बहन के लिये जितने मधुर वाक्य बोल सकता था बोलने लगा ऐसा लग रहा था जैसे इस लड़की को उस लड़के ने नही बल्कि उसकी मां य बहन ने छेड़ा हो। यह मुद्दा अब व्यक्तिगत से अब पूर्णतः पारिवारिक हो चुका था। परिवार का शायद ही ऐसा कोई सदस्य बचा हो जिसे अपशब्द न कहे गये हों। इतने में मैं भी वहां पहुंच गया और यह सब देखने लगा। हमारे यहां यह प्रथा भी बहुत प्रचलित है कि हम लोग दूसरे के घर में लगी आग का तमाशा बहुत ही मज़े से देखते हैं। मैं अपने मित्र की प्रेमिका के चहरे पर इंसान को कटते हुए देखने की वही कौतुहल दृष्टि देख रहा था जो कि भारत-पाकिस्तान के मैच के दौरान सभी भारतीयों के चेहरे पर तब होती है जब चार गेंदों पर चार रन चाहिये होते हैं और हर खाली जाती गेंद उन्हें निराश कर देती है। इस प्रेमिका के चहरे पर भी कुछ वैसे ही भाव आ-जा रहे हैं। जैसे जैसे समय गुज़रता जा रहा है वैसे वैसे इसको अपना इंसान को कटते देखने का सपना टूटता सा लग रहा है। उधर मेरे उस दोस्त और उस लड़के के बीच की गहमा गहमी तो समय के साथ बढ़ती जा रही थी परंतु बात इसके आगे बढ़ ही नहीं रही थी। खैर बात आगे बढ़ भी कैसे सकती थी जब पूरे देश में हमारे पड़ोसी देश से भेजे जा रहे आतंकवादियों के प्रत्यक्ष प्रमाण होने के बावज़ूद दोनो के बीच बात सिर्फ आर-पार की लड़ाई की बात तक ही पहुंच पाती है तो यहां उस बात के आगे बात कैसे बढ़ जाती। काफी समय तक यह सब देखने के बाद जब मुझे यह यकीन हो गया कि अब किसी भी हालत में बात आगे नहीं बढ़ेगी तब मैने बीच बचाव कर के दोनों को अपने अपने रास्ते जाने को कहा और मैं अपने इस दोस्त और उसकी प्रेमिका के साथ हे चल पड़ा। उसकी प्रेमिका के चेहरे पर विषाद की रेखायें साफ दिखाई दे रही थीं। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कि किसी बच्चे का कोई नया खिलौना टूट गया हो। अब मैंने अपने दोस्त से कहा कि “यार तूने फालतू में ही उस बंदे से पंगा लिया कभी कभी ऐसी जगह पर बाकी लोगों की तरह गांधी जी के पहले बंदर का अनुशरण कर लेना चाहिये।“ तो उसने अपने उसी अन्दाज़ मे कहा कि “यार वो तो उसकी किस्मत अच्छी थी कि अभी नवरात्रे चल रहे हैं और इस समय मैं किसी पर हांथ नहीं उठाता नहीं तो तू तो जानता ही है कि मैं आदमी काटने से भी परहेज़ नहीं करता।“ इस समय मेरे मित्र के मुख से यह बात सुन कर उसकी प्रेमिका के सब्र के बांध टूट गये। वह एक दम चिढ़ कर बोली “एक केक तो सही ढंग से कटता नहीं है बात करते है आदमी काटने की।“

Saturday, August 16, 2008

जुलाब की गोली

दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हमेशा यही शक़ रहता है कि लोग उनके विरुद्ध षड़यंत्र रच रहे हैं। और ये लोग यह सोच सोच कर अपने इर्द गिर्द ऐसी दीवार बना लेते हैं कि कुछ दिनों बाद इन्हें यह विश्वास हो जाता है कि दुनिया के किसी भी कोने में यदि कुछ भी होता है तो वह सब उनके विरुद्ध हो रहे षड़यंत्र का ही हिस्सा है। यदि अमेरिका अफ्गानिस्तान पर हमला करता य फिर लादेन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर तो भी ऐसे लोगों को लगता है कि ये सब घटनाक्रम भी उनके खिलाफ हो रहे षड़यंत्र का हिस्सा हैं। यदि गल्ति से इन लोगों का नसबंदी का ऑपरेशन फेल हो जाए तो ये लोग कहेंगे कि यह डॉक्टरों का इनके विरुद्ध कोई षड़यंत्र है। जब ऐसे लोग अपने इहलोक में वर्षों का शतक लगा कर उहलोक में जाते हैं तो ये इस बात को नहीं मानते कि वे एक स्वभाविक क्रिया के स्वरूप अपना शरीर त्याग रहे हैं बल्कि यह कहते है कि उनके परिवार वाले उनके विरुद्ध षड़यंत्र कर के उन्हें मार रहे हैं।
वह मुझे जब भी मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे वह सारे शहर से ही नहीं बल्कि सारी दुनिया से तृस्त है। उसके चेहरे पर हमेशा लोगों को बेबकूफ बनाने वाली एक मुस्कान खिली रहती है। इसमें गलती उसकी नहीं है दरअसल जब दर्शनशास्त्र, हिंदी साहित्य, अपराध शास्त्र और रंगमंच चारों की कॉकटेल बन जाए तो एक नया नशा तैयार होता है। दर्शनशास्त्र चीज़ों को देखने का एक नया नज़रिया देता है। हिन्दी साहित्य भाषा को आकर्षित बना देता है। अपराध शास्त्र हर चीज़ के पीछे किसी षड़यंत्र के होने का बोध कराता है। और रंगमंच एक बहुत ही अच्छा पटकथा लेखक और अभिनेता बना देता है। उनके अन्दर भी ये चारों गुण मौज़ूद थे। हालांकि वे एक सरकारी महकमे में कार्य करते थे परंतु यह उनका पार्टटाइम बिज़नेस था। मुख्य रूप से उनकी एक सपने बेचने की दुकान थी जिसे उन्होंने शायद अपनी पत्नी या फिर किसी और पारिवारिक सदस्य के नाम पर खोला था। अपने देश मे सरकारी नौकरियां अधिकतर पार्टटाइम ही होती हैं क्यों कि इन लोगों का मुख्य व्यवसाय कुछ और ही होता है आखिर ऐसा हो भी क्यों न अपने यहां सरकारें भी तो पार्टटाइम ही होती हैं।
हां तो हम बात कर रहे थे उन महाशय की। तो इनका काम है सपने बेचना। जिसे पूरे शहर में किसी कॉलेज में कहीं प्रवेश नहीं मिल रहा हो वो इनके सपने बेचने की दुकान यनि कि कॉलेज में आराम से प्रवेश लेकर पढ़ सकता है। इनके इस कॉलेज की एक खास बात और है और वो यह कि यहां पढ़ने वालो की सूची में वो सभी लोग मिल जाएंगे जिनका पढ़ाई से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इनके कॉलेज में कुल मिलाकर चार कमरे हैं जिनमें से एक पर इनका खुद का अधिकार है और बाकी बचे तीन में से एक में ऑफिस के नाम पर एक काऊंटर है और दो में कुछ कुर्सियां यह दिखाने के लिए लगा रखीं है कि कभी कभी यहं पर क्लास लग जाती है। हर सत्र के प्रारम्भ में यह कॉलेज ऐसे सजाया जाता है जैसे कि बारात आने से पहले दुल्हन को सजाया जाता है। शहर के किसी एक कोने से एक ऐसी सुन्दर लड़की को ढूंढ कर लाया जाता है जो ज़रूरतमंद हो, सुन्दर हो और जिसने अभी अभी योवन की दहलीज़ पर कदम रखा हो। आखिर चूहे को पिंजरे की तरफ आकर्षित करने के लिए रोटी का टुकड़ा तो रखना ही पड़ता है। तो ये होती हैं तैयारियां। उसके बाद फिर शुरू होता है बच्चों के आने जाने का सिलसिला। प्रवेश के लिए बच्चों को लुभाने का सिलसिला।
जब कोई लड़का प्रवेश की जानकारी के लिए आता है तो सबसे पहले वो मुखातिब होता है फ्रंट ऑफिस में बैठी हुई अधखिली कली से जिसे खिलाने की इच्छा उस भंवरे के मन में अनायास ही जाग्रत हो जाती है। ये अधखिली कली भोजन के पहले एपेटाईज़र सूप का काम करती है। उसके बाद फिर दूसरे चरण में उस लड़के को पेश किया जाता है एक और बाला के सामने जो फ्रंट ऑफिस वाली लड़की से थोड़ी ज़्यादा प्रोफेशनल है इसीलिए इसे प्रशासनिक अधिकारी कहा जाता है। इसके चेहरे पर एक मुस्कान हमेशा खिली रहती है जो हंसी तो फंसी वाले फंडे का उपयोग लड़को को फंसाने के लिए करती है। लड़के भी उसके पर्वत से तने हुए विराट योवन और वात्स्यायन को मात देती शारीरिक भावभंगिमाओं की चिकनी सतह पर बड़े आराम से फिसल जाते हैं। इसके बाद उस लड़के को ले जाया जाता है इन महाशय के पास जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं। इस आधे फंसे हुए लड़के को देख कर इन महाशय के चहरे पर एक खास चमक आ जाती है जैसी किसी भेड़िये के चहरे पर दिखाई देती है जब उसके सामने कोई मेमना आ जाता है। अब ये अपने चहरे पर एक मुस्कान ले कर उस लड़के के अन्दर एक साथ कई सारी भावनाओं के विंड चाइम्स छेड़ देते है। अपने कक्ष में बिठाकर उस लड़के को सारी दुनिया का सफर करा देते हैं। वहीं बैठे बैठे उसे कहां कहां के सपने दिखा देते है। और अंततः शिकार जाल में फंस जाता है।
इन महाशय के जीवन में यह दिनचर्या आम हो गई है। और जब इन्हें अपने जीवन में रोमांच की कमी महसूस होती है तो यह महाशय अपने जान-पहचान के लोगों के बीच से एक व्यक्ति का चुनाव करते हैं। उसके बाद फिर ये एक पटकथा का लेखन करते हैं जिसके केंद्र मे होता है इनका यह कॉलेज और नायक होते हैं ये खुद परंतु दुर्भाग्यवश खलनायक बन जाता है वह चयनित व्यक्ति जिसका चुनाव ये अपने जान-पहचान के लोगों में से करते हैं।
एक दिन मुझे भरी दोपहर इनका फोन आया “बेटा मैं तुम्से मिलना चाहता हूं। बहुत ज़रूरी काम है।“ मैं भी उनकी आदत से अनभिज्ञ अपने सारे काम छोड़ कर उनके पास पहुंचा। मैं जैसे ही उनके रूम पर पहुंचा तो मुझे देख कर उनके चेहरे पर ऐसी तृप्ति आई जैसी कि मेमने को देख कर किसी भेड़िए के मुख पर आती है। उन्होने मुझे बड़े प्यार से बिठाया तो मैं समझ गया कि आज फिर कोई नई जासूसी कहानी सुननी पड़ेगी। मैं अपने आप को तैयार कर ही रहा था कि उन्होने झट से कहा कि “बेटा मुझे लग रहा है कि हमारे प्रतियोगी कॉलेज वाले षड़यंत्र रच रहे हैं कि किसी तरह अपना कॉलेज बंद हो जाए।“ मैने अपने मन मे कहा कि प्लॉट तो ऐसे गढ़ा जा रहा है जैसे कि इंडिया और पाकिस्तान का मैच चल रहा हो और दोनो टीमों के खिलाड़ी अपना अपना खेल खेलने की जगह उल्टे सीधे थ्रो मार कर दोनो टीमों के खिलाड़ियो को चोटिल करने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हों। फिर उनसे लगभग 2 घंटे बात हुई जिसका निष्कर्ष यह निकला कि सारे शहर के कॉलेजों ने मिलकर यह षड़यंत्र रचा है कि किसी तरह इनका कॉलेज बन्द हो जाए। मैंने उनकी यह बातें सुनी उनका रस लिया और फिर आकर अपने काम में लग गया।
किसी तरह दो महीने निकल गये और इन दो महीनो मे इत्तेफाक़ से उनके और उनके कॉलेज के छात्रों के बीच कुछ विवाद हुआ और एक साथ 12 लड़कों ने अपना प्रवेश इस कॉलेज से रद्द करा कर दूसरे कॉलेज में करवा लिया। और मेरी बद्किस्मती से वे सभी छात्र मेरे से बहुत अच्छे से बात करते थे। अब तो इन महाशय की बाछें ही खिल गईं। इन्हें बहुत आसानी से एक ऐसा सॉफ्ट टार्गेट मिल गया जिस पर ये इल्ज़ाम भी लगा सकते थे और उसे सुना भी सकते थे तो फिर उन्होंने इस शुभ कार्य मे देरी नहीं की और उसी समय मुझे फोन कर के आने को कहा। मैं भी हमेशा की तरह निश्चिंत हो कर उनके पास गया। मेरे पहुंचते ही उन्होने मेरा इंटेरोगेशन शुरू कर दिया। “तुम आमुक तारीख को आमुक समय पर कहां थे? किसके साथ थे? क्या कर रहे थे?” मैं इस तरह मशीनगन से छूटती गोलियों कि तरह आते इतने सवालों से परेशान हो कर बोला कि मैं कही घड़ी देख कर थोड़ी खड़ा होता हूं।” बस उन्हें मिल गया मौका उन्होंने छोटते ही बोला कि तुम भी विपक्षियों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध षड़यंत्र कर रहे हो। उनकी इस बात से सारी पिक्चर मेरे सामने थोड़ी थोड़ी क्लीयर होने लगी। मैं धीरे धीरे सब कुछ समझने लगा और जब मैं सब कुछ समझ गया तो मैं अब इस स्थिति का रस लेने लगा। बस वे जो भी आरोप प्रत्यारोप लगाते मैं उन्हे चुप चाप सुनता और फिर आकर अपने काम में लग जाता।
ऐसे ही जब तीन महीने बीत गए तो मैने उनसे मिलना जुलना एक दम बन्द कर दिया। वे अगर कभी बुलाते भी तो मैं उनसे मिलने नही जाता और जब उन्होने परेशान हो कर एक दिन कहा कि क्या बात है मुझे तुमसे एक बहुत ज़रूरी काम है और तुम हो कि मिलने ही नहीं आ रहे हो। तो मैने भी इस बार उनसे कह दिया कि दरअसल मैं आपसे मिलना नहीं चाहता क्यों कि मैं अभी कुछ ज़रूरी कामो में लगा हुआ हूं और अगर मैं अभी आपसे मिलने आऊंगा तो फिर वही आप कोई नया मनगढ़ंत आरोप प्रत्यारोप लगाएंगे और फिर मेरा टाइम खराब होगा। और मैं इस समय यह नहीं चाहता। मेरी तरफ से ऐसा अप्रत्याशित जवाब सुन कर बे चकरा गए। और फिर उनकी मुझ से बात चीत नहीं हुई। परंतु अभी कुछ ही दिनों पहले मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी तबियत ज़रा खराब चल रही है। उसके अगले दिन मेरी उन डॉक्टर साहब से भी नमस्कार चमत्कार हो गई जो उनका इलाज कर रहे थे। मैंने डॉक्टर से बात की तो पता चला कि उन्हें एक खास किस्म की कब्ज़ हो गई है पर खुद डॉक्टर परेशान है कि यह कब्ज़ किस चीज़ की है। वे बड़े अचंभे से बता रहे थे कि उन्होंने जुलाब लगने की सारी दवाईयां दे कर देख लीं परंतु सब की सब बे असर। मेरा मन किया कि मैं उन डॉक्टर साहब को बता दूं कि यह किसी और चीज़ की नहीं बल्कि उनके पेट मे पक रही एक नई षड़यंत्र कथा का कब्ज़ है जिसे सही करने के लिए किसी दवाई की नहीं बल्कि एक इंसान की ज़रूरत है जो उनकी इस षड़यंत्र कथा का खलनायक बन सके। जाते जाते डॉक्टर साहब मुझ से बोले कि “चलिए आप तो उनके बहुत खास हैं आप खुद ही देख लीजिये कि उनकी तबीयत कैसी है।“ मैने चलते चलते उन्हें नमस्कार किया और कहा कि मांफ कीजिए अभी थोड़ा ज़रूरी काम से जा रहा हूं और वैसे भी फिलहाल मेरा जुलाब की गोली बनने का कोई मूड नहीं है।

(यह व्यंग्य पूर्णतः काल्पनिक है अतः पाठको से अनुरोध है कि इसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ कर देखें)

Saturday, November 3, 2007

.......... बोल गई

एक दिन हमारी कक्षा में एक लड़की आई।
उसे देख कर दिल में प्यार की घंटी टनटनाई
तो मैने निश्चय किया,
अब तो जीना है या मरना है।
लेकिन उससे अपने,
प्यार का इज़हार ज़रूर करना है।
तभी मुझे एक विज्ञापन याद आया।
जिसमें था रवीना ने गाया।
लिखते-लिखते लव हो जाए।
तो मैने सोचा हो सकता है,
इस पेन से मेरी किस्मत जग जाए।
तो मैं भागा और वह पेन खरीद कर लाया।
फिर उसे पूरे दिलोजान से सजाया।
और मौका देख कर वह पेन,
उसके बैग में घुसाया।
वह आई, जैसे ही पेन निकालना चाहा,
हाँथों मे मेरा ही पेन आया।
जैसे ही उसने शुरु की लिखाई,
मेरा मन हर्षाया।
लिखकर दो लाईनें उसने मुझे देखा,
और मंद-मंद मुस्काया।
उसे हंसता देख मुझे
हँसी तो फँसी वाला फंडा याद आया।
पीरियड खत्म हुआ वह एक बार फिर मुस्काई।
फिर धीरे-धीरे चलकर मेरे पास आई।
उसे आता देख सर से पाँव तक पसीने छूट गए।
मन में हज़ारों-लाखों लड्डू फूट गए।
उसने आकर कहा यह पेन आपने दिया?
मैने कह हाँ आपको गिफ्ट किया।
उसने फिर कुछ सोचा और बोली,
यू लव मी,डू यू?
मेरे कुछ बोलने से पहले उसने कहा,
आई लव यू टू।
और पेन के लिए भैया व्हेरी-व्हेरी थैंक यू।
उस दिन दिल पर ऐसी गाज़ गिरी कि मेरी
आत्मा डोल गई।
लड़की गई सो गई मगर जाते-जाते
भैया बोल गई।

Tuesday, October 16, 2007

हास्य रस

एक दिन मुझे भी कविता लिखने का शौक चढ़ा।
तो मैं भी इस पथ पर आगे बढ़ा।
सोचा चलो सौंदर्य रस पर लिखता हूं।
आम लोगों से थोड़ा अलग दिखता हूं।
तो लिखने के लिए मैं दौड़ा-दौड़ा घर आया।
और प्रेरणा के लिए पत्नी को सामने बिठाया।
और कविता लिखनी शुरू की।
एक से बढ़कर एक उपमाएं दीं।
कविता कुछ यूं बनी:-
तेरी घनी ज़ुल्फें जैसे हों घोड़े की पूंछ।
होंठों के ऊपर तेरे हल्की मोटी मूंछ।
आवाज़ तेरी शेरनी जैसी और टमाटर से गाल।
चाल भी तेरी मस्त मस्त है ज्यों हाथी की चाल।
जैसे ही ये लाईनें हमने पत्नी को सुनाईं।
वह हम पर शेरनी सी गुर्राई।
हमने कहा भाग बेटा वर्ना तेरी शामत आई।
भागते-भागते मैं सोच रहा थी कि,
मेरी कविता से ये कैसा जादू चल गया।
मेरा सौंदर्य रस पत्नी के रौद्र रस में कैसे बदल गया।
आँखें बंद कर कर मैं दौड़ा-दौड़ा आया।
आँख खुलने पर अपने को एक मंच पर खड़ा पाया।
और जब मैने अपनी यह व्यथा वहाँ सुनाई।
तो लोगों को बड़ी ज़ोर-ज़ोर से हँसी आई।
और तब मुझे यह समझ में आया।
कि जब भी कोई दुःखी अपना दुःख,
दुनिया को सुनाता है।
तो वह खुद ही दुनिया के लिए,
हास्य रस का एक काव्य बन जाता

Sunday, October 14, 2007

वंस मोर प्लीज़

एक दिन एक लड़की यूं ही चली जा रही थी।
मन ही मन शायद कोई गीत गा रही थी।
तभी अचानक वो एक लड़के से टकराई।
और सम्भलते ही उस लड़के पर गुर्राई।
निर्दोष होने पर भी वह सब कुछ सुनता रहा।
और लड़की से एक शब्द भी नहीं कहा।
लड़की स्थिति भाँप गई कि लड़का शर्मिन्दा है।
वह तो शहर का सीधा सादा सभ्य बाशिन्दा है।
तो स्थिति सुधारने के लिए लड़की ने,
एक के बाद एक व्यंग्य बाण सरकाया।
लड़का कोछ कहे बिना ही,
उन पर मंद-मंद मुस्काया।
लड़की ने फिर कहा आप तो लड़कियों की तरह शरमा रहे हैं।
मैं ही मैं बोले जा रही हूं आप कुछ नही फरमा रहे हैं।
इस पर लड़के के सब्र के बांध टूट गए।
उसके कण्ठ से कुछ स्वर फूट गए।
उसने अपने चेहरे को किया संजीदा,
और हँसी को किया सीज़।
और धीरे से कहा,
मडम वंस मोर प्लीज़।

Saturday, October 13, 2007

कुर्सी ज़िन्दाबाद

यहाँ सभी के दर्शन छोटे और बड़े हैं नाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।
रखते हैं सब बगल में छुरी और अधरों पर राम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

न दुआ चले न दवा चले।
बस आए पैसे की खुश्बू,
जब-जब भी यहाँ पर हवा चले।
यहाँ पैसे से हो हर काम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

कहने को है यह लोकतंत्र।
जो है विकास का मूलमंत्र।
पर इन खद्दर वालों ने,
किया इसका काम तमाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

यहाँ ईमानदारी की छाप हैं डंडे।
अच्छे-अच्छों के बाप हैं डंडे।
यहाँ सब डंडे को करे सलाम,
कि कुर्सी ज़िन्दाबाद।

Tuesday, October 2, 2007

मियाँ मुशर्रफ

क्यों मियाँ मुशर्रफ?
क्या फौज ने बना दिया है आपको
इतना टफ
कि नहीं पड़ता आप पर
कोई असर विरोध का।
लोगों की पसन्द पर,
किए गए शोध का।
क्या आप नहीं समझ पाते,
सेना और लोकतंत्र
के बीच का अंतर।
शासन का मंतर।
सेना है तंत्र बंधन का
और लोकतंत्र है बंधन तंत्र का।
ध्यान रखिए इस मंत्र का।
और राष्ट्रपति बनने की हठ छोड़िए।
क्यों कि नहीं चलती
कोई भी हठ प्रजातंत्र में।
भले हो बालहठ या राजहठ,
नहीं रखतीं अस्तित्व
एक देश स्वतंत्र में।
मैं कहता हूं अब भी समय है,
चेत जाइए।
औरों को सुकूं से खाने दीजिए और
खुद भी खाइए।
यदि आप अपनी कुमति को,
सुमति पर नहीं लाएंगे।
तो आप भी एक दिन भुट्टो की
गति पाएंगे।

Monday, October 1, 2007

राजनीति

राजनीति शास्त्र के पेपर में,
एक प्रश्न आया।
जिसमें था प्रश्नकर्ता ने फरमाया।
बताओ राजनीति क्या बला है?
यह विज्ञान है या कला है?
चूंकि हम इस विषय का नाम सुनकर,
भाग जाते थे।
सपने में भी यह विषय आए तो नींद से,
जाग जाते थे।
और क्योंकि यह विषय हमे बिल्कुल,
नहीं भाता था।
इसीलिये हमें,
इस प्रश्न का उत्तर भी नहीं आता था।
फिर भी हमने थोड़ा कॉमनसेंस लगाया।
जो था बोलकुल नॉंनसेंस लगाया।
और लिखा:-
यह विज्ञान और कला दोनो का इल्म है।
जो एक्शन और कॉमेडी से भरपूर है,
वह फिल्म है।
विज्ञान इसीलिए कि इसमें जनता पर,
एक्सपेरीमेंट किए जाते हैं।
साम,दाम,दण्ड और भेद की नीति से,
उनके वोट लिए जाते हैं।
जो जनता के सेवक बनते हैं,
वो ही उनकी खाल नोंच-नोंच कर खाते हैं।
हर तरह के काण्ड करते हैं,
फिर भी बार-बार चुने जाते हैं।
इसी के ज़रिए इन्होंने देश को बार-बार
छला है।
इसीलिए यह हर कला से बड़ी कला है।

Sunday, September 23, 2007

राजनीति

कभी चारा घोटाला देती है।
तो कभी हवाला देती है।
लोगों को वोटों के खातिर,
नोटों की माला देती है।
ना कहे कोई, है दाल में काला,
रंग दाल का काला देती है।
झूठ को घर में रख कर,
सच को देश निकाला देती है।
जिनको ना मिला हो अन्न कभी,
उन्हें मधुरस का प्याला देती है।
जिसका पानी बदबू मारे,
यह वो नाला देती है।
जिसमें फंस कर ना निकल सको,
राजनीति वो जाला देती है।

वर्तमान

आज हर क्षेत्र में,
झूठ का बोलबाला है।
और सच्चाई का मुँह काला है।
भ्रष्टाचार को,
खद्दर पहनने वालों ने ,
जेबों में अपनी पाला है।
करते हैं सभी गोरख धंधे।
सब हैं अर्थ मोह में अंधे।
आज उनका भी भगवान है पैसा,
जिनके हाँथों में माला है।
तुम आये जिसकी रपट लिखाने,
उसका कुछ भी न बिगडेगा।
वह तो यहाँ के थानेदार का,
होने वाला साला है।
वो है मेट्रिक फेल तो क्या?
और तुम हो आई.ए.एस. तो क्या?
तुम करो गुलामी अब उसकी,
वह नेता बनने वाला है।

ब्लोगोमेनिया

जब से तकनीकि ने अपने पैर पसारे हैं तब से हमारे देश में बीमारियां भी टेक्निकल हो गयी हैं। वर्तमान में ऐसी ही एक बीमारी का पता चला है जिसका कोई इलाज नहीं है और जिसका संक्रमण दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। जी हां मैं ब्लोगोमेनिया की ही बात कर रहा हूं। हालांकि यह बीमारी अभी नयी है परंतु इसके मरीज़ दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहे हैं। यूं तो यह बीमारी एक शौक के रूप में शुरू होती है पर फ़िर धीरे-धीरे अपना विकराल रूप धारण कर लेती है और इससे प्रभवित व्यक्ति को ब्लोग लिखने के सिवा कुछ भी नहीं सूझता। बह दिन-रात बस अपने ब्लोग को लिखने और उसे और अधिक पठनीय बनाने में ही लगा रहता है। इस बीमारी से पीङित व्यक्ति की यह मानसिकता विकसित हो जाती है कि अपने ब्लोग या फ़िर चिट्ठे की मदद से वह अपनी अवाज़ सारी दुनिया में पहुंचा सकता है और वह इसी भ्रम में जीता रहता है। इस बीमारी की सबसे बङी समस्या है इसका इलाज क्यों कि अभी तक इसका इलाज खोजा नहीं जा सका है। वर्तमान मेँ इसके बढते हुये संक्रमण को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि यदि शीघ्र ही इसका इलाज ना ढूंढा गया तो यह बीमारी सारे भारत को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को अपनी गिरफ़्त में ले लेगी। और यदि यहाँ बीमारी इसी रफ्तार से बढती रही तो यह एक अंतर्राष्ट्रिय समस्या का रूप धारण कर लेगी। खासकर उन संगठनो एवं लोगों के लिये जो सच्चाई को दबाने के लिये सदैव तत्पर रहते हैँ।

Saturday, September 15, 2007

बाकी सब ठीक है

एक शाम चिट्ठानंद महाराज ने अपने चेले को बुला कर कि चेले बहुत दिनों से मैने कहीं भ्रमण नहीं किया। कई दिनों से तो इस कुटिया से बाहर भी नहीं निकला, पर तुम तो आया जाया करते हो तो अब तुम ही बताओ कि देश दुनिया में क्या चल रहा है? स्वामी जी की इस बात पर चेले ने देश दुनिया की खबर देना आरंभ किया। वह बोला, महाराज जहाँ तक दुनिया की खबर की बात है तो दुनिया में शांति है। अमेरिक अभी अपने नये शिकार की तलाश कर रहा है। चीन को तो बस अपने व्यापार से ही मतलब है और आज कल वह अपने व्यापार का विस्तार करने में ही व्यस्त है। और रही बात भारत की तो भारत में भी सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा है। बस महिलायें असुरक्षित हैं। अपराध पहले से बहुत अधिक हो गये हैं। लोगों की परेशानियां ज़्यदा हो गयी हैं। भ्रष्टाचार ने अपने पैर पूरी तरह से फ़ैला लिये हैं। संविधान के चारों स्तंभों को भी भ्रष्टाचार की घुन लग गयी है। चौथा और सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले मीडिया एक मंडी की तरह हो गया है। वह अब बस टी.आर.पी. बढ़ाने में ही लगा रहता है। राष्ट्रभाषा को एक तरह से देश से बाहर कर दिया गया है। संतोष आजकल एक विलुप्त प्राणी हो गया है। परंतु फ़िर भी लोग हँसते हैं, खेलते हैं, और तथाकथित रूप से अपने जीवन का भरपूर आनंद उठा रहे हैं क्यो कि लोगों ने उत्तेजित होना बंद कर दिया है। उनके अंदर से स्वयं का बोध समाप्त हो गया है। पर सब कुछ ठीक है। इतना सुन कर चिट्ठानंद जी ने अपने कानों पर हाँथ रख लिये और चेले को कहा, “अब बस करो! अब इसके आगे सुनना मेरे लिये असहनीय है।

Friday, September 14, 2007

चिट्ठानंद का परिचय

सबसे पहले तो मैं आप लोगों का इन महाशय से आप लोगों का परिचय करा दूं। दर-असल ये एक बहुत ही शांत, सौम्य, एवं शालीन व्यक्तित्व के धनी हैं। बाल-ब्रम्हचारी हैं। अरे आप लोग गलत मत समझिये इनके बाल ब्रम्हचारी नहीं हैं, बल्कि इन्होने अपनी बाल्यावस्था में ही ब्रम्हचर्य का व्रत धारण कर लिया था। अब ये सारी मोह माया त्याग कर सन्यासी हो गये हैं और सारे दिन बस अपनी साधना में लीन रहते हैं।
इनका एक सेवक है जिसे ये “चेले” कह कर संबोधित करते हैं। उनका यह सेवक दिनभर उनकी सेवा करता है और जब स्वामी जी कहते हैं तो उन्हे देश दुनिया का हाल बता देता है।
(अभी इन स्वामी जी का इतना ही परिचय है आप लोगों के द्वारा पूछे जाने अन्यथा समय-समय पर पर इनके परिचय में और कङियां जुङती जायेंगी)

© Vikas Parihar | vikas