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Tuesday, April 8, 2008

रात

मेंढक की टर्र-टर्र,
झींगुर के स्वर,
भयभीत मन कंपित कर,
तन पर चुभते हवाओं के शर,
अंतर उद्वेलित बाहर नीरव,
मन में होते आतंकित अनुभव,
मंथर गति से चलती वात;
यही है रात।

Sunday, November 18, 2007

छांव प्यार की

मैने तो मांगी थी तुझसे छाँव तेरे प्यार की,
पर तुमने मुझको दे दिया क्यों एक टुकड़ा धूप का।

Saturday, November 17, 2007

धूप का टुकड़ा

तुमने मुझको दे दिया जो एक टुकड़ा धूप का,
उससे रोशन हो गया मेरा यह सारा जहाँ।

Friday, November 16, 2007

इज़हार

बोल कर भी कह न पाया तुमसे दिल का हाल मैं,
मौन रह कर कह दिया मुझसे तुमने हाल-ए-दिल।

तन्हाई

तन्हाइयों ने मुझको कुछ इस तरह से तोड़ा,
अब आईने में अपना अस्तित्व खोजता हूँ।

Tuesday, October 23, 2007

ऐ मौत मुझे ले चल

दिल में उथल-पुथल है,
मन में मची है हलचल।
ऐ मौत मुझे ले, ऐ मौत मुझे ले चल।

Friday, October 19, 2007

कर लेंगे

जहाँ हुई है शब हम वहीं पे सहर कर लेंगे।
हम तो बस आपके तसव्वुर मे बसर कर लेंगे।
अगर वो वादा करे हमसे तुम्हे खुश रखने का,
तो उसके नाम हम अपनी सारी उमर कर लेंगे।

Thursday, October 11, 2007

समय के पाट

कोल्हू के पाटों के बीच जिस तरह फंस,
कर निकल जाता है गन्ने का रस,
बस
उसी तरह समय के पाट भी चूस
लेते हैं आदमी का जूस,
और निचोड़ लेते है,
उसकी नस-नस।

Tuesday, October 2, 2007

नग्नता

स्वर्थ सिद्धी में मग्न।
आज शब्द हुए नग्न।
लज्जा को तज।
हम निर्लज्ज।
खींसे निपोरते झांकते हैं।
एक दूजे की नग्नता को ताकते हैं।

Sunday, September 30, 2007

धुआँ

कल ताशब
इस कदर धुआँ उठा,
कि चाँद काला पड़ गया।
डाल दिया था किसी ने,
लकड़ियों की जगह
दिल अपना चूल्हे में।

© Vikas Parihar | vikas