मेंढक की टर्र-टर्र,
झींगुर के स्वर,
भयभीत मन कंपित कर,
तन पर चुभते हवाओं के शर,
अंतर उद्वेलित बाहर नीरव,
मन में होते आतंकित अनुभव,
मंथर गति से चलती वात;
यही है रात।
Tuesday, April 8, 2008
रात
लेखक:-
विकास परिहार
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23:21
2
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Sunday, November 18, 2007
छांव प्यार की
मैने तो मांगी थी तुझसे छाँव तेरे प्यार की,
पर तुमने मुझको दे दिया क्यों एक टुकड़ा धूप का।
लेखक:-
विकास परिहार
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00:26
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Saturday, November 17, 2007
धूप का टुकड़ा
तुमने मुझको दे दिया जो एक टुकड़ा धूप का,
उससे रोशन हो गया मेरा यह सारा जहाँ।
लेखक:-
विकास परिहार
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00:12
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Friday, November 16, 2007
इज़हार
बोल कर भी कह न पाया तुमसे दिल का हाल मैं,
मौन रह कर कह दिया मुझसे तुमने हाल-ए-दिल।
लेखक:-
विकास परिहार
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18:12
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
तन्हाई
तन्हाइयों ने मुझको कुछ इस तरह से तोड़ा,
अब आईने में अपना अस्तित्व खोजता हूँ।
लेखक:-
विकास परिहार
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18:08
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Tuesday, October 23, 2007
ऐ मौत मुझे ले चल
दिल में उथल-पुथल है,
मन में मची है हलचल।
ऐ मौत मुझे ले, ऐ मौत मुझे ले चल।
लेखक:-
विकास परिहार
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15:52
4
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Friday, October 19, 2007
कर लेंगे
जहाँ हुई है शब हम वहीं पे सहर कर लेंगे।
हम तो बस आपके तसव्वुर मे बसर कर लेंगे।
अगर वो वादा करे हमसे तुम्हे खुश रखने का,
तो उसके नाम हम अपनी सारी उमर कर लेंगे।
लेखक:-
विकास परिहार
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18:42
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Thursday, October 11, 2007
समय के पाट
कोल्हू के पाटों के बीच जिस तरह फंस,
कर निकल जाता है गन्ने का रस,
बस
उसी तरह समय के पाट भी चूस
लेते हैं आदमी का जूस,
और निचोड़ लेते है,
उसकी नस-नस।
लेखक:-
विकास परिहार
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02:09
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Tuesday, October 2, 2007
नग्नता
स्वर्थ सिद्धी में मग्न।
आज शब्द हुए नग्न।
लज्जा को तज।
हम निर्लज्ज।
खींसे निपोरते झांकते हैं।
एक दूजे की नग्नता को ताकते हैं।
लेखक:-
विकास परिहार
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12:35
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Sunday, September 30, 2007
धुआँ
कल ताशब
इस कदर धुआँ उठा,
कि चाँद काला पड़ गया।
डाल दिया था किसी ने,
लकड़ियों की जगह
दिल अपना चूल्हे में।
लेखक:-
विकास परिहार
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15:36
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर