कोई पुरुष किसी स्त्री की कमज़ोरी होता है इस बात के तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते परंतु स्त्री हर पुरुष की कमज़ोरी होती है यह बात तय है। इसीलिए चाहे कितना भी बड़ा योगी क्यों न हो उसकी तपस्या हमेशा भंग हुई है और उस तप-भंग के पीछे किसी न किसी स्त्री का ही हाथ रहा है। आज तक किसी स्त्री के तप भंग की कोई घटना का उल्लेख नहीं पाया गया और यदि पाया भी गया तो उसके पीछे किसी पुरुष का हाथ नही रहा। एक समय पर स्थितियां इतनी बिगड़ गयी थीं कि कई योगियों ने तो सिर्फ भोग की लालसा में ही योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाया था। तब तंग आकर ईश्वर को अपना यह तप भंग करने का प्लान और तरीका बदलना पड़ा।
परंतु पुरुष का स्त्री देह के लिए चिरस्थाई कौतूहल अभी तक वैसा ही है जैसा कि आदि काल मे था। अभी कुछ दिनो पहले हमारे कार्यालय मे एक लड़की साक्षात्कार देने के लिए आई। उसके वस्त्रों को देख कर ही लग गया कि वह साक्षात्कार के लिए आई है। उसकी सुगढ़ देह के सारे अंग प्रत्यंग मानो उसके वस्त्रों की सीमाओं को लांघ कर बाहर आने को लालायित हों। ऐसा लग रहा था कि उसके अंग प्रत्यंगों ने उसके वस्त्रों की सरकार के खिलाफ ज़िहाद छेड़ रखा हो। हमारे कार्यालय के सभी लड़को की भावनाएं उस लड़की को देख कर मृगछौने की तरह कुलांचें मारने लगीं। सभी लोग अपनी-अपनी कुर्सियों से उठ कर उसकी तरफ ऐसी कातर निगाहों से देखने लगे जैसे कि एक भूखा कुत्ता किसी भोजन कर रहे व्यक्ति की तरफ देखता है। वह जिस रूम मे बैठ कर अपना इंटरव्यू दे रही थी उसी तरफ हम लोगों के ऑफिस का टॉयलेट भी था। अब हमारे ऑफिस के सभी लड़को का बारी बारी से उस तरफ जाने का सिलसिला शुरू हो गया। और मैं इस सोच में पड़ गया कि उस सुन्दरी ने अपने मदभरे नयनों से ऐसा कौन सा रस पिलाया है कि इन लोगों का यह सिलसिला थम ही नहीं रहा है। उस लड़की को देखते ही मानव विज्ञान के सारे नियमों को तोड़ कर इन लड़कों की किडनियां भी पुरुष प्रवृति के अनुरूप बेहद अप्रत्याशित ढ़ंग से व्यवहार करने लगीं थी। अब मुझे यह समझ आ रहा था कि हमारे गांव के रामदीन काका अपनी भदेस भाषा मे हमेशा यह क्यों कहते थे कि “औरत जब अपनी पर आती है तो अच्छे-अच्छे का मूत निकाल देती है।“
वह लड़की भी ऑफिस के सभी लड़कों की यह हरकतें देख रही थी। उस समय वह अपने को किसी विश्व सुन्दरी से कम नहीं समझ रही थी। और लड़के यह सोच रहे थे कि काश इसकी शर्ट का एक बटन और खुला होता या फिर जींस ही थोड़ा और लो वेस्ट होती हालांकि उससे ज़्यादा लो वेस्ट का मतलब फिर लो हिप्स हो जाता। अपना इंटरव्यू देकर वह लड़की जब बाहर निकली तब सभी लड़के उसे ऐसी कातर निगाहों से देख रहे थे जैसे कि मन्दिर या सड़को पर भीख मांगने वाले बड़ी-बड़ी कार वालो को कुछ पाने की लालसा में देखा करते हैं। वह लड़की भी जाते जाते उन सभी के अरमानों पर पानी फेरती हुई अपनी निगाहों में ठीक वैसी ही हीनदृष्टि डालती हुई चली गई जैसी कि बड़ी-बड़ी गाड़ी वाले तथाकथित बड़े लोग भिखारियों पर डालते हुए चले जाते हैं।
हमारे देश में हमेशा अक्षमता हीनता का पर्याय रही है और स्त्री देह के आगे तो अच्छे से अच्छा और सक्षम से सक्षम व्यक्ति भी हीन और अक्षम हो जाता है। परंतु अपने ऑफिस के लड़कों का यह हाल देख कर मुझे अनायास ही गोर्की की एक कहानी “26 मेन एंड ए वूमन” याद आ गई जिसमें 26 मजदूर एक पिंजरेनुमा डबलरोटी के कारखाने में काम करते थे। जहां उनकी हालत किसी सुअर से भी बदतर थी। उनके लिए ज़िन्दगी का सबसे सुखद क्षण मात्र वही होता था जब मालिक की जवान लड़की वहां से निकलती थी। वे सभी उसे सींखचों से देखा करते और मन ही मन प्रसन्न हो कर तृप्तता का अनुभव करते। उनके जीवन के रेगिस्तान में इस लड़की के दर्शनों के रूप में ही थोड़ी सी हरियाली आती थी। वे सभी उसे किसी देवी की तरह पूजते थे और मन ही मन वे सभी उस से अलग अलग और इकट्ठे प्यार करते थे। एक दिन जब वह लड़की अपने समवर्गी प्रेमी के साथ बाहर निकलती है तो वे सभी आदतन उसे सींखचों से झांक कर देखते हैं। वह लड़की उनकी तरफ एक नज़र देखती है और कहती है – सुअर कहीं के! और अपने समवर्गी प्रेमी के साथ चली जाती है।
Friday, September 19, 2008
स्त्री और पुरुष
लेखक:-
विकास परिहार
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श्रेणी:- कथायें एवं किस्से, व्यंग्य
Monday, September 1, 2008
आदमी काटने का परहेज़
हमारे देश मे यह प्रथा काफी पुरानी है कि अर्धांगिनी यनि कि धर्मपत्नि रणक्षेत्र में जाने वाले पति को हथियार थमाती है और हर स्त्री, पुरुष की वीरगथाओं को सुन कर अपना हृदय उस पुरुष को दे बैठती है। त्रेता मे भगवति सीता खुद राम को धनुष दे कर आखेट के लिए भेजती थीं। जोधाबाई भी युद्ध के वक़्त अकबर को हथियार अपने हाथों से देती थीं। संयोगिता भी पृथ्वी राज चौहान की वीर गाथाओं को सुन कर ही सर्व प्रथम उन पर मोहित हुई थी। कालांतर में गुण नहीं बदले बस प्रकार बदल गए हैं।
मेरा भी एक मित्र है जो हमेशा कहता रहता है कि “मैं तो आदमी काटने से भी परहेज नहीं करता।” मैं जब भी उसके बारे मे सोचता हूं तो मुझे दुनिया एक सब्ज़ी के बगीचे की तरह नज़र आती है। जहां भांति-भांति की सब्ज़ियां लगी हुई है और मेरा यह मित्र छुरा ले कर उन्हे काटने के लिए बैठा हुआ है। इस समय मुझे गांधी जी अपने इस मित्र के सामने बहुत छोटे और अज्ञानी नज़र आते हैं जो व्यर्थ ही आजीवन लोगों को अहिंसा का पाठ सिखाते रहे। हां तो मैं बात कर रहा था अपने इस मित्र की, तो इसकी एक बहुत अच्छी आदत थी और वो यह कि जब भी कोई बात होती तो यह घुमा फिरा कर उस बात को खत्म अपने इसी डायलॉग से करता कि “मैं तो आदमी काटने से भी परहेज नहीं करता।“ और बात-बात पर अपने शरीर के कुछ घावों को दिखा कर उनको इतना अतिरंजित कर के उनकी कहानी सुनाता जैसे वो घाव किसी गली नुक्कड़ की लड़ाई में नहीं बल्कि कारगिल-युद्ध के दौरान घुसपेठियों को खदेड़ते वक्त उसे उपहार स्वरूप मिले हों। मैं जब भी उसके मुखार्विंद से उसकी वीरगाथाएं एवं वीरता के कारनामे सुनता तो मुझे अपनी भीरुता पर अन्दर ही अन्दर शर्म आने लगती और मैं अपने आप को बेचारे टाइप का महसूस करता।
वहीं उसकी प्रेमिका भी भारतीय सभ्यता का निर्वाह बड़ी सादगी से करती थी। वह भी अपनी सभी सहेलियों को बड़े गर्व से अपने प्रेमी की वीरता के कारनामे बड़े मसालेदार तरीके से सुनाती थी। और इस समय उसकी सभी सहेलियों को उनके डॉक्टर एवं इंजीनियर प्रेमी बड़े ही तुच्छ और निकम्मे लगने लगते। भला वो लड़के भी कोई लड़के हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में किसी भी तरह की लड़ाई नहीं की और जिनके शरीर पर किसी तरह के मार-पीट के चिन्ह न हों। ऐसे ही उसकी एक सहेली का एक प्रेमी मेरे पास बहुत चिंतित हो कर आया और कहने लगा कि “भैया मैं तो बड़ी समस्या में फंस गया हूं। अब आप ही बताइये कि मैं क्या करूं?” मैने उस से बड़ी सहृदयता से पूछा कि “क्या हो गया तुम इतने परेशान क्यों हो?” तो वह बड़ा परेशान हो कर बोलने लगा कि “भैया मेरी गर्लफ्रेंडॅ को पिछले कुछ दिनों से पता नहीं क्या हो गया है वह अब मुझसे हमेशा यह कहती रहती है कि मैने अपनी ज़िन्दगी के 25 वर्ष यूं ही व्यर्थ गंवा दिये। आज तक एक भी लड़ाई नहीं की, किसी के साथ मार-पीट नहीं की, मेरे शरीर पर किसी तरह का कोई निशान नहीं है। और अगर एक हफ्ते के अन्दर मैने किसी से लड़ाई नहीं की तो वह मुझे छोड़ देगी।“ उसकी यह बात सुन कर मेरे सामने सारा किस्सा साफ हो गया। मैने उस से कहा “तो इसमें कौन सी बड़ी बात है अगर तुम्हें अपना प्रेम बचाना है तो भिड़ जाओ किसी से भी।“ तो वह बोला “ऐसे कैसे किसी से भी बिना किसी कारण के भिड़ जाऊं।” तो मैने उसे समझाते हुए कहा कि “ तुम्हे किसने कहा कि किसी से भिड़ने के लिये किसी कारण की आवश्यकता होती है। अब अमेरिका को ही देख लो वह क्या किसी से कारणवश भिड़ता है? और वैसे भी आज कल प्रेम और लड़ाई एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं अब अमेरिका को ही लो वह दूसरे देशों पर हमला करता है क्यों कि वह वहां के लोगों को प्यार करता है। पाकिस्तान काश्मीर मे आतंकवादी भेजता है क्यों कि वह काश्मीर को प्यार करता है। एक भाई दूसरे भाई का गला काटता है क्योंकि वे एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं। इसीलिए आजकल अगर अपने प्रेम को बचाना है तो हिंसा तो करनी ही पड़ेगी। वर्ना तुम्हरी प्रेमिका तुम्हे छोड़ कर चली जायेगी। मेरी बात पता नहीं उसे अच्छी लगी य नहीं पर वह दोबारा मेरे पास नहीं आया।
परंतु मेरा दोस्त और उसकी प्रेमिका जब तब मुझे मिलते रहते हैं। एक दिन मेरे दोस्त के बर्थडे पर मुझे वे दोनो मिल गये। मैंने अपने दोस्त से पूछा “और आज क्या गिफ्ट मे मिल रहा है?” तो मेरे दोस्त ने मुस्कुरा कर कहा कि “देख आज इसने मुझे कितनी प्यारी कटार गिफ्ट की है।” मेरे मन ने यह सुनते ही झट से उस सक्षात देवी को प्रणाम कर लिया जो अपने प्रेमी को उपहार में कटार देती है और मन से आवज़ आई कि धन्य हो देवी तुम्हारे इन श्रीचरणों में इस निकृष्ट प्राणी का शत शत नमन।
ऐसे ही एक दिन वह मुझे अपनी पीठ का एक निशान दिखा कर बोला कि “पता है यह चोट मुझे तब लगी थी जब आमुक बन्दे से मेरी लड़ाई हो गई थी। और पता है तब मेरी उम्र सिर्फ 14 साल थी।“ मुझे लगा कि इतनी खुशी खुद खुदीराम बोस को तब नहीं हुई होगी जब वह फांसी पर लटका था। पर चाहे कुछ भी हो मेरा यह दोस्त है बहुत ही गज़ब जब भी कोई पंगा होता है तो मेरा यह दोस्त छूटते ही कहता है “चल उसे तोड़ कर आते हैं। या चल बहुत हो गया अब उसे फोड़ ही डालते है।“ ऐसा लगता है जैसे यह किसी इंसान को तोड़ने फोड़ने की बात ऐसे करता है जैसे कि वे सभी कोई मिट्टी के पुतले हों। उसका और उसकी प्रेमिका का ज़िंदगी को देखने का नज़रिया एक दम ही अलग है। हुआ यूं कि अक बार मेरे इस दोस्त की गर्दन में हल्की सी मोच आ गई और उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। तो उनकी यह प्रेमिका जो अपने प्रेमी की वीरगाथाओं का बखान करते कभी अघाती नहीं थीं और जो इन्हें कटार सप्रेम भेंट स्वरूप देतीं थी वे मोहतरमा इन्हें अस्पताल में भर्ती करते वक़्त फूट फूट कर रोने लगीं। जब डॉक्टर इन्हें इंजेक्शन लगा रहा था तो इनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह डॉक्टर उनके इंजेक्शन न लगाकर इनके शरीर मे गोली दाग रहा हो। यह सीन देख कर मेरे मुख से अनायास ही निकल पड़ा कि वाह री मेरे भारतवर्ष की आधुनिक युगीन नारी जो देती है भेंट स्वरूप कटारी और बताती है तलवार और फरसों की लड़ाई के किस्से पर डरती है एक इंजेक्शन से। पर इस बात में भी कोई आश्चर्य नहीं है क्यों कि अक्सर ऐसा देखने में आया है कि बड़े बड़े योद्धा छोटी सी छिपकली और कॉक्रोच से डरते हैं। हम लोग अर्जुन महाभारत तो जीत जाता है परंतु अपने अंतर्द्वन्द से लड़ने के लिए उसे भी कृष्ण की आवश्यकता पड़ती है। हम बाहर के दुश्मनों का तो डटकर मुक़ाबला कर लेते हैं परंतु अपने अन्दर के शत्रुओं से लड़ने मे नाकाम हो जाते हैं। सिकन्दर भी विश्व को जीतने की राह पर तो बहुत आगे निकल पड़ा था परंतु स्वयं को जीतने की राह पर एक कदम भी न बढ़ा सका। अंग्रेजों ने दुनिया भर पर कब्ज़ा कर लिया था पर अपनी बुराईयों पर कब्ज़ा नही कर पाये।
मगर मेरा यह दोस्त इन सब से अलग है क्यों कि यह सब्ज़ी काटने में एक बार परहेज़ कर लेता है परंतु आदमी काटने में कतई परहेज़ नहीं करता ये अलग बात है कि आज तक इसे आदमी काटने का कोई एक्सपीरियंस या तजुर्बा नहीं है। और इस से भी अलग है इसकी प्रेमिका जो अपने प्रेमी के गहरे घावों को तो बहुत ही प्रसन्नता से देख लेती है परंतु उसे एक इंजेक्शन लगते नहीं देख सकती। एक बार की बात है दोनो नवदुर्गा महोत्सव देख रहे थे तभी एक मनचला मेरे इस दोस्त की प्रेमिका को छेड़ने के इरादे से कुछ कमेंट कर देता है। प्रेमिका बड़े अरमान ले कर अपने प्रेमी को यह बात बताती है। उसे लगता है कि आज यह अपने प्रेमी के हाथों एक इंसान कटते देख ही लेगी। उसके चेहरे पर वैसी ही खुशी नज़र आती है जैसी किसी बर्थडे पार्टी के वक़्त बच्चों के चेहरे पर केक कटने के पहले नज़र आती है। मेरा यह दोस्त भी बड़े तैश में उस लड़के के पास पहुंचा और पहुंचते ही उसकी मां-बहन के लिये जितने मधुर वाक्य बोल सकता था बोलने लगा ऐसा लग रहा था जैसे इस लड़की को उस लड़के ने नही बल्कि उसकी मां य बहन ने छेड़ा हो। यह मुद्दा अब व्यक्तिगत से अब पूर्णतः पारिवारिक हो चुका था। परिवार का शायद ही ऐसा कोई सदस्य बचा हो जिसे अपशब्द न कहे गये हों। इतने में मैं भी वहां पहुंच गया और यह सब देखने लगा। हमारे यहां यह प्रथा भी बहुत प्रचलित है कि हम लोग दूसरे के घर में लगी आग का तमाशा बहुत ही मज़े से देखते हैं। मैं अपने मित्र की प्रेमिका के चहरे पर इंसान को कटते हुए देखने की वही कौतुहल दृष्टि देख रहा था जो कि भारत-पाकिस्तान के मैच के दौरान सभी भारतीयों के चेहरे पर तब होती है जब चार गेंदों पर चार रन चाहिये होते हैं और हर खाली जाती गेंद उन्हें निराश कर देती है। इस प्रेमिका के चहरे पर भी कुछ वैसे ही भाव आ-जा रहे हैं। जैसे जैसे समय गुज़रता जा रहा है वैसे वैसे इसको अपना इंसान को कटते देखने का सपना टूटता सा लग रहा है। उधर मेरे उस दोस्त और उस लड़के के बीच की गहमा गहमी तो समय के साथ बढ़ती जा रही थी परंतु बात इसके आगे बढ़ ही नहीं रही थी। खैर बात आगे बढ़ भी कैसे सकती थी जब पूरे देश में हमारे पड़ोसी देश से भेजे जा रहे आतंकवादियों के प्रत्यक्ष प्रमाण होने के बावज़ूद दोनो के बीच बात सिर्फ आर-पार की लड़ाई की बात तक ही पहुंच पाती है तो यहां उस बात के आगे बात कैसे बढ़ जाती। काफी समय तक यह सब देखने के बाद जब मुझे यह यकीन हो गया कि अब किसी भी हालत में बात आगे नहीं बढ़ेगी तब मैने बीच बचाव कर के दोनों को अपने अपने रास्ते जाने को कहा और मैं अपने इस दोस्त और उसकी प्रेमिका के साथ हे चल पड़ा। उसकी प्रेमिका के चेहरे पर विषाद की रेखायें साफ दिखाई दे रही थीं। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कि किसी बच्चे का कोई नया खिलौना टूट गया हो। अब मैंने अपने दोस्त से कहा कि “यार तूने फालतू में ही उस बंदे से पंगा लिया कभी कभी ऐसी जगह पर बाकी लोगों की तरह गांधी जी के पहले बंदर का अनुशरण कर लेना चाहिये।“ तो उसने अपने उसी अन्दाज़ मे कहा कि “यार वो तो उसकी किस्मत अच्छी थी कि अभी नवरात्रे चल रहे हैं और इस समय मैं किसी पर हांथ नहीं उठाता नहीं तो तू तो जानता ही है कि मैं आदमी काटने से भी परहेज़ नहीं करता।“ इस समय मेरे मित्र के मुख से यह बात सुन कर उसकी प्रेमिका के सब्र के बांध टूट गये। वह एक दम चिढ़ कर बोली “एक केक तो सही ढंग से कटता नहीं है बात करते है आदमी काटने की।“
लेखक:-
विकास परिहार
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श्रेणी:- कथायें एवं किस्से, व्यंग्य
Saturday, August 16, 2008
जुलाब की गोली
दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हमेशा यही शक़ रहता है कि लोग उनके विरुद्ध षड़यंत्र रच रहे हैं। और ये लोग यह सोच सोच कर अपने इर्द गिर्द ऐसी दीवार बना लेते हैं कि कुछ दिनों बाद इन्हें यह विश्वास हो जाता है कि दुनिया के किसी भी कोने में यदि कुछ भी होता है तो वह सब उनके विरुद्ध हो रहे षड़यंत्र का ही हिस्सा है। यदि अमेरिका अफ्गानिस्तान पर हमला करता य फिर लादेन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर तो भी ऐसे लोगों को लगता है कि ये सब घटनाक्रम भी उनके खिलाफ हो रहे षड़यंत्र का हिस्सा हैं। यदि गल्ति से इन लोगों का नसबंदी का ऑपरेशन फेल हो जाए तो ये लोग कहेंगे कि यह डॉक्टरों का इनके विरुद्ध कोई षड़यंत्र है। जब ऐसे लोग अपने इहलोक में वर्षों का शतक लगा कर उहलोक में जाते हैं तो ये इस बात को नहीं मानते कि वे एक स्वभाविक क्रिया के स्वरूप अपना शरीर त्याग रहे हैं बल्कि यह कहते है कि उनके परिवार वाले उनके विरुद्ध षड़यंत्र कर के उन्हें मार रहे हैं।
वह मुझे जब भी मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे वह सारे शहर से ही नहीं बल्कि सारी दुनिया से तृस्त है। उसके चेहरे पर हमेशा लोगों को बेबकूफ बनाने वाली एक मुस्कान खिली रहती है। इसमें गलती उसकी नहीं है दरअसल जब दर्शनशास्त्र, हिंदी साहित्य, अपराध शास्त्र और रंगमंच चारों की कॉकटेल बन जाए तो एक नया नशा तैयार होता है। दर्शनशास्त्र चीज़ों को देखने का एक नया नज़रिया देता है। हिन्दी साहित्य भाषा को आकर्षित बना देता है। अपराध शास्त्र हर चीज़ के पीछे किसी षड़यंत्र के होने का बोध कराता है। और रंगमंच एक बहुत ही अच्छा पटकथा लेखक और अभिनेता बना देता है। उनके अन्दर भी ये चारों गुण मौज़ूद थे। हालांकि वे एक सरकारी महकमे में कार्य करते थे परंतु यह उनका पार्टटाइम बिज़नेस था। मुख्य रूप से उनकी एक सपने बेचने की दुकान थी जिसे उन्होंने शायद अपनी पत्नी या फिर किसी और पारिवारिक सदस्य के नाम पर खोला था। अपने देश मे सरकारी नौकरियां अधिकतर पार्टटाइम ही होती हैं क्यों कि इन लोगों का मुख्य व्यवसाय कुछ और ही होता है आखिर ऐसा हो भी क्यों न अपने यहां सरकारें भी तो पार्टटाइम ही होती हैं।
हां तो हम बात कर रहे थे उन महाशय की। तो इनका काम है सपने बेचना। जिसे पूरे शहर में किसी कॉलेज में कहीं प्रवेश नहीं मिल रहा हो वो इनके सपने बेचने की दुकान यनि कि कॉलेज में आराम से प्रवेश लेकर पढ़ सकता है। इनके इस कॉलेज की एक खास बात और है और वो यह कि यहां पढ़ने वालो की सूची में वो सभी लोग मिल जाएंगे जिनका पढ़ाई से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इनके कॉलेज में कुल मिलाकर चार कमरे हैं जिनमें से एक पर इनका खुद का अधिकार है और बाकी बचे तीन में से एक में ऑफिस के नाम पर एक काऊंटर है और दो में कुछ कुर्सियां यह दिखाने के लिए लगा रखीं है कि कभी कभी यहं पर क्लास लग जाती है। हर सत्र के प्रारम्भ में यह कॉलेज ऐसे सजाया जाता है जैसे कि बारात आने से पहले दुल्हन को सजाया जाता है। शहर के किसी एक कोने से एक ऐसी सुन्दर लड़की को ढूंढ कर लाया जाता है जो ज़रूरतमंद हो, सुन्दर हो और जिसने अभी अभी योवन की दहलीज़ पर कदम रखा हो। आखिर चूहे को पिंजरे की तरफ आकर्षित करने के लिए रोटी का टुकड़ा तो रखना ही पड़ता है। तो ये होती हैं तैयारियां। उसके बाद फिर शुरू होता है बच्चों के आने जाने का सिलसिला। प्रवेश के लिए बच्चों को लुभाने का सिलसिला।
जब कोई लड़का प्रवेश की जानकारी के लिए आता है तो सबसे पहले वो मुखातिब होता है फ्रंट ऑफिस में बैठी हुई अधखिली कली से जिसे खिलाने की इच्छा उस भंवरे के मन में अनायास ही जाग्रत हो जाती है। ये अधखिली कली भोजन के पहले एपेटाईज़र सूप का काम करती है। उसके बाद फिर दूसरे चरण में उस लड़के को पेश किया जाता है एक और बाला के सामने जो फ्रंट ऑफिस वाली लड़की से थोड़ी ज़्यादा प्रोफेशनल है इसीलिए इसे प्रशासनिक अधिकारी कहा जाता है। इसके चेहरे पर एक मुस्कान हमेशा खिली रहती है जो हंसी तो फंसी वाले फंडे का उपयोग लड़को को फंसाने के लिए करती है। लड़के भी उसके पर्वत से तने हुए विराट योवन और वात्स्यायन को मात देती शारीरिक भावभंगिमाओं की चिकनी सतह पर बड़े आराम से फिसल जाते हैं। इसके बाद उस लड़के को ले जाया जाता है इन महाशय के पास जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं। इस आधे फंसे हुए लड़के को देख कर इन महाशय के चहरे पर एक खास चमक आ जाती है जैसी किसी भेड़िये के चहरे पर दिखाई देती है जब उसके सामने कोई मेमना आ जाता है। अब ये अपने चहरे पर एक मुस्कान ले कर उस लड़के के अन्दर एक साथ कई सारी भावनाओं के विंड चाइम्स छेड़ देते है। अपने कक्ष में बिठाकर उस लड़के को सारी दुनिया का सफर करा देते हैं। वहीं बैठे बैठे उसे कहां कहां के सपने दिखा देते है। और अंततः शिकार जाल में फंस जाता है।
इन महाशय के जीवन में यह दिनचर्या आम हो गई है। और जब इन्हें अपने जीवन में रोमांच की कमी महसूस होती है तो यह महाशय अपने जान-पहचान के लोगों के बीच से एक व्यक्ति का चुनाव करते हैं। उसके बाद फिर ये एक पटकथा का लेखन करते हैं जिसके केंद्र मे होता है इनका यह कॉलेज और नायक होते हैं ये खुद परंतु दुर्भाग्यवश खलनायक बन जाता है वह चयनित व्यक्ति जिसका चुनाव ये अपने जान-पहचान के लोगों में से करते हैं।
एक दिन मुझे भरी दोपहर इनका फोन आया “बेटा मैं तुम्से मिलना चाहता हूं। बहुत ज़रूरी काम है।“ मैं भी उनकी आदत से अनभिज्ञ अपने सारे काम छोड़ कर उनके पास पहुंचा। मैं जैसे ही उनके रूम पर पहुंचा तो मुझे देख कर उनके चेहरे पर ऐसी तृप्ति आई जैसी कि मेमने को देख कर किसी भेड़िए के मुख पर आती है। उन्होने मुझे बड़े प्यार से बिठाया तो मैं समझ गया कि आज फिर कोई नई जासूसी कहानी सुननी पड़ेगी। मैं अपने आप को तैयार कर ही रहा था कि उन्होने झट से कहा कि “बेटा मुझे लग रहा है कि हमारे प्रतियोगी कॉलेज वाले षड़यंत्र रच रहे हैं कि किसी तरह अपना कॉलेज बंद हो जाए।“ मैने अपने मन मे कहा कि प्लॉट तो ऐसे गढ़ा जा रहा है जैसे कि इंडिया और पाकिस्तान का मैच चल रहा हो और दोनो टीमों के खिलाड़ी अपना अपना खेल खेलने की जगह उल्टे सीधे थ्रो मार कर दोनो टीमों के खिलाड़ियो को चोटिल करने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हों। फिर उनसे लगभग 2 घंटे बात हुई जिसका निष्कर्ष यह निकला कि सारे शहर के कॉलेजों ने मिलकर यह षड़यंत्र रचा है कि किसी तरह इनका कॉलेज बन्द हो जाए। मैंने उनकी यह बातें सुनी उनका रस लिया और फिर आकर अपने काम में लग गया।
किसी तरह दो महीने निकल गये और इन दो महीनो मे इत्तेफाक़ से उनके और उनके कॉलेज के छात्रों के बीच कुछ विवाद हुआ और एक साथ 12 लड़कों ने अपना प्रवेश इस कॉलेज से रद्द करा कर दूसरे कॉलेज में करवा लिया। और मेरी बद्किस्मती से वे सभी छात्र मेरे से बहुत अच्छे से बात करते थे। अब तो इन महाशय की बाछें ही खिल गईं। इन्हें बहुत आसानी से एक ऐसा सॉफ्ट टार्गेट मिल गया जिस पर ये इल्ज़ाम भी लगा सकते थे और उसे सुना भी सकते थे तो फिर उन्होंने इस शुभ कार्य मे देरी नहीं की और उसी समय मुझे फोन कर के आने को कहा। मैं भी हमेशा की तरह निश्चिंत हो कर उनके पास गया। मेरे पहुंचते ही उन्होने मेरा इंटेरोगेशन शुरू कर दिया। “तुम आमुक तारीख को आमुक समय पर कहां थे? किसके साथ थे? क्या कर रहे थे?” मैं इस तरह मशीनगन से छूटती गोलियों कि तरह आते इतने सवालों से परेशान हो कर बोला कि मैं कही घड़ी देख कर थोड़ी खड़ा होता हूं।” बस उन्हें मिल गया मौका उन्होंने छोटते ही बोला कि तुम भी विपक्षियों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध षड़यंत्र कर रहे हो। उनकी इस बात से सारी पिक्चर मेरे सामने थोड़ी थोड़ी क्लीयर होने लगी। मैं धीरे धीरे सब कुछ समझने लगा और जब मैं सब कुछ समझ गया तो मैं अब इस स्थिति का रस लेने लगा। बस वे जो भी आरोप प्रत्यारोप लगाते मैं उन्हे चुप चाप सुनता और फिर आकर अपने काम में लग जाता।
ऐसे ही जब तीन महीने बीत गए तो मैने उनसे मिलना जुलना एक दम बन्द कर दिया। वे अगर कभी बुलाते भी तो मैं उनसे मिलने नही जाता और जब उन्होने परेशान हो कर एक दिन कहा कि क्या बात है मुझे तुमसे एक बहुत ज़रूरी काम है और तुम हो कि मिलने ही नहीं आ रहे हो। तो मैने भी इस बार उनसे कह दिया कि दरअसल मैं आपसे मिलना नहीं चाहता क्यों कि मैं अभी कुछ ज़रूरी कामो में लगा हुआ हूं और अगर मैं अभी आपसे मिलने आऊंगा तो फिर वही आप कोई नया मनगढ़ंत आरोप प्रत्यारोप लगाएंगे और फिर मेरा टाइम खराब होगा। और मैं इस समय यह नहीं चाहता। मेरी तरफ से ऐसा अप्रत्याशित जवाब सुन कर बे चकरा गए। और फिर उनकी मुझ से बात चीत नहीं हुई। परंतु अभी कुछ ही दिनों पहले मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी तबियत ज़रा खराब चल रही है। उसके अगले दिन मेरी उन डॉक्टर साहब से भी नमस्कार चमत्कार हो गई जो उनका इलाज कर रहे थे। मैंने डॉक्टर से बात की तो पता चला कि उन्हें एक खास किस्म की कब्ज़ हो गई है पर खुद डॉक्टर परेशान है कि यह कब्ज़ किस चीज़ की है। वे बड़े अचंभे से बता रहे थे कि उन्होंने जुलाब लगने की सारी दवाईयां दे कर देख लीं परंतु सब की सब बे असर। मेरा मन किया कि मैं उन डॉक्टर साहब को बता दूं कि यह किसी और चीज़ की नहीं बल्कि उनके पेट मे पक रही एक नई षड़यंत्र कथा का कब्ज़ है जिसे सही करने के लिए किसी दवाई की नहीं बल्कि एक इंसान की ज़रूरत है जो उनकी इस षड़यंत्र कथा का खलनायक बन सके। जाते जाते डॉक्टर साहब मुझ से बोले कि “चलिए आप तो उनके बहुत खास हैं आप खुद ही देख लीजिये कि उनकी तबीयत कैसी है।“ मैने चलते चलते उन्हें नमस्कार किया और कहा कि मांफ कीजिए अभी थोड़ा ज़रूरी काम से जा रहा हूं और वैसे भी फिलहाल मेरा जुलाब की गोली बनने का कोई मूड नहीं है।
(यह व्यंग्य पूर्णतः काल्पनिक है अतः पाठको से अनुरोध है कि इसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ कर न देखें)
लेखक:-
विकास परिहार
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03:02
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श्रेणी:- कथायें एवं किस्से, व्यंग्य
Friday, July 4, 2008
चंदू लाल के छंद
1) आम आदमी पर पड़ी मंहगाई की मार|
वो भी एक दम शांत हो सहता अत्याचार|
सहता अत्याचार और अब कोई न चारा|
दो पाटों के बीच में पिसता है बेचारा|
बस हिसाब ही करता रहता छोड़ छाड़ सब काम|
आम आदमी बन गया चूसा हुआ एक आम|
2) लाल रंग ने कर रखा है यू पी ऐ को लाल|
न्यूक डील ने देख लो कैसा किया कमाल|
कैसा किया कमाल की जान गले में अटकी|
कामधाम सब छोड़ यू पी ऐ भी पथ भटकी|
राजनीति ने खा लिए जाने कितने साल|
लाल रंग वाले बने अब गुदड़ी के लाल|
लेखक:-
विकास परिहार
at
14:42
2
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श्रेणी:- चंदू लाल के छंद
Tuesday, July 1, 2008
हिन्दोस्तान की हम हैं शान
नज़र उठाई धरा पर जिसने आँख फोड़ कर आयेंगे|
गर दुश्मन ने हाँथ उठाया खून की नदी बहाएंगे |
दिल में एक तूफ़ान छिपा है सीना है फौलादी|
हमको अपनी जान से प्यारी है अपनी आज़ादी|
भारत की सेना के हम जवान, हिन्दोस्तान की हम हैं शान|
टाईगर हिल पर किया जब कब्ज़ा दुश्मन ने इतरा के|
पल में दूर खदेडा उसको वो बिखर गया छितरा के|
पैर हमारे नहीं बांधते राखी, कुमकुम, चंदन रोली|
बंदूकों से मने दीवाली और दुश्मन के खून से होली|
अपनी जान की हमें न परवाह, हम ले लें दुश्मन की जान|
भारत की सेना के हम जवान, हिन्दोस्तान की हम हैं शान|
लेखक:-
विकास परिहार
at
18:46
5
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Saturday, June 28, 2008
एक अधूरी प्रेम कहानी
पहली नज़र मे शायद ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे आकर्षित कर सके सिवाय उसके बहुत ऊंचे पद और प्रभावशाली व्यक्तित्व के। आवाज़ बहुत मीठी थी। आंखें जैसे बहुत कुछ छिपाने की कोशिश करती थीं। जब भी मैं उसे देखता था तो लगता था कि इन शांत आंखों के अन्दर न जाने कितना बड़ा बवंडर छिपा हुआ है। पर फिर भी उसकी हंसी बहुत निर्मल थी। आज भी जब आंखें बन्द करता हूं तो उसका हंसता हुआ चेहरा याद आता है। पता नहीं उस वक़्त का आकर्षण कब दिल की गहराई के किसी अन्धेरे कोने मे आकर छिप कर बैठ गया पता ही नहीं चला। आज जब समय की निरंतर आगे बढ़ती हुई सुइयों को पीछे घुमाता हूं तो एक एक कर के सारी बातें याद आ जातीं हैं। वो जब पहली बार ऑफिस मे रात भर रुके थे तो अचानक उसका कहना कि “यार चाय पीने का मन कर रहा है।“ यह सुन कर यूं तो सभी एक दूसरे का मुंह देखने लग गये थे। फिर उसी समय बस स्टेंड जा कर चाय लाया तो चाय की पहली चुस्की के बाद जो संतुष्टी देखी तो शायद उस समय मन को एक अजीब सी अलौकिक अनुभूति हुई। उस एक पल में जैसे सारी दुनिया कि खुशी समा गई थी। फिर उसके बाद मेरा सारा समय बस ऐसे ही पलों का इंतेज़ार करने मे गुज़रने लगा जिनमे उसके मुंह से किसी चीज़ की मांग निकले और मैं उसे पूर करूं। फिर उसके उसी हंसमुख चेहरे को देखूं। मुझे लगता है कि उस समय मुझे उसके चेहरे पर संतुष्ति के भाव को देखने का ऐसा नशा चढ़ा था कि और कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।
हालांकि मेरे साथ और भी कई लोग थे वे भी किन्ही न किन्ही तरीको से उसे प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। और मैं अपने अंतर्मुखी व्यक्तित्व की वजह से एक मूक दर्शक की तरह येह सब होते हुए देख रहा था। और जिस तरह समय की मार से एक सदी की मुलाय चीज़ें दूसरी सदी तक आते आते कठोर हो जाती हैं उसी तरह उसका नाम भी समय के साथ मेरे दिल मे और गहरा गुदता जा रहा था। जहां और लोग उसे प्रभावित करने के लिए कई सारे जतन कर रहे थे वहीं मैं बस उसकी छोटी छोटी ज़रूरतें पूरी कर के ही खुश था। और ऐसे ही एक दिन उसके जाने का दिन आ गया। मैं सुबह जल्दी उठ कर उसे छोड़ने के लिए एअरपोर्ट पहुंचा तो देखता हू कि मैं कुछ ज़्याद ही जल्दी आ गया हूं। करीब एक घंटे के बाद वो जब वो आई तो उसका सबसे पहला प्रश्न था “कब से इंतज़ार कर रहे हो?”
मैने बोला “बस अभी एक ही घंटा हुआ है”
उसने फिर पूछा “और सिगरेट कितनी पीं इतनी देर में?”
मैने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया “अभी तो बस चार ही पीं हैं”
उसने भी अपने उसी अन्दाज़ मे कहा “तुम नहीं सुधरोगे”
मैने भी मुस्कुरा कर कहा “अरे अगर मैं सुधर गया तो मैं मैं नहीं रहूंगा”
फिर काफी देर तक हम लोग यूं ही बातें करते रहे कि तब तक उसके प्लेन का टाइम हो गया। तभी अचानक मुझे याद आया तो मैने बोला कि यार मैं तुम्हारी घड़ी लाना भूल गया तो उसने भी हंसते हुए कहा कि कोई बात नहीं और बह एयरपोर्ट के अन्दर चली गई।
हालांकि उस से आज भी फोन पर बात हो जाती है। बीच में एक बार वो इस शहर में आई भी थी पर शायद समय की कमी के कारण उसके लिए सूचना दे पाना भी सम्भव नहीं था इसीलिए नहीं दी। पर उस दिन के बाद से उसकी घड़ी मेरे सिरहाने ही रखी हुई है और मैं उस घड़ी की टिक टिक मे उसके दिल की धड़कनें आज तक सुनता हूं।
लेखक:-
विकास परिहार
at
02:32
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श्रेणी:- कथायें एवं किस्से
Tuesday, June 24, 2008
चंदू लाल के छंद
१) जमकर ब्लोगिंग कर रहे आमिर और अमिताभ
फ़िर भी इस से मिल रहा नहीं उनको कोई लाभ
उनको कोई लाभ क्यो नहीं मिल रहा जाने
काम धाम सब छोड़ कसे शाहरुख पारा ताने
शाहरुख ख़ुद में मस्त हैं नही रहते है कहीं थम कर
जिसको भी करना है करे उनकी बुराई जमकर
२) रंग जमा रहे सब जगह सैफ करीना साथ
खुल्लम खुल्ला घूमते ले हांथों मी हांथ
ले हांथों मे हाँथ हाय कैसी बेशर्मी,
एक तो तेवर मिर्च से और ऊपर से गर्मी
जाने कितने दिन चले उनका यह प्रेम प्रसंग
जब तक दोनों संग हैं तब तक ही है रंग
३) राम गोपाल वर्मा ने जब थी बनाई आग
आधी पिक्चर देख कर गयी सारी पब्लिक भाग
गयी सारी पब्लिक भाग और सब पीटें सर को
देते गाली रामू को सब लौटें घर को
फ़िर बनाएं शोले यह सपना देखें सुबह शाम
सुन कर उनकी बात यह सब बोलें बस हे राम
लेखक:-
विकास परिहार
at
16:31
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श्रेणी:- चंदू लाल के छंद
Monday, May 19, 2008
आंखें भर आती हैं
जब भी देखता हूं
बच्चों को रोते हुए
भूखों को सोते हुए
पाप को होते हुए
आंखें भर आती हैं।
जब भी देखता हूं
सच का दम घुटते हुए
अस्मिता को लुटते हुए
गिद्धों को जुटते हुए
आंखें भर आती हैं।
जब भी देखता हूं
सेक्स के व्यापार को
झूठ के प्रचार को
दरिंदगी, अत्याचार को
आंखें भर आती हैं।
जब भी देखता हूं
बिके हुए समाज को
अंधों के राज को
कल को और आज को
आंखें भर आती हैं।
लेखक:-
विकास परिहार
at
02:42
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श्रेणी:- नया प्रयोग
Saturday, May 17, 2008
मौत क तांडव
(1)
अब
मैं इस असमंजस मैं हूं
कि इसे मौत का तांडव कहूं
या
मौत का डिस्को?
तांडव तो वो होता है
जिसमें अधर्मी मरते हैं
और जिसे शिव करते हैं।
पर आज कल तो
ये डिस्को हो गया है
जिसे अधर्मी करते हैं और
इसमे शिव मरते हैं।
(2)
सन 1947 से पहले
मैं हर बार वीरगति को प्राप्त होता था
पर उसके बाद
मैं मरा हूं बार-बार
लगातार।
रक्त से सना हुआ है मेरा शरीर,
क्षत-विक्षत हैं मेरे अंग प्रत्यंग,
भावना शून्य हो गया है हृदय,
क्या एक उम्र के बाद
हर मां को यही देखना पड़ता है?
(3)
हम लोग बहुत माहिर हैं
दौड़ाने में कागज़ी घोड़े।
हमेशा रहते हैं आगे हम आंकड़ों मे।
रोज़ होने वाली लाखों मौतों में,
नहीं होती हमारे यहां एक भी मौत
भूख से ,
भले ही सोते हैं लाखों लोग भूखे
हर रोज़।
लेखक:-
विकास परिहार
at
02:21
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श्रेणी:- नया प्रयोग
Friday, May 16, 2008
ख्वाब
(1)
रात के नीरव अन्धेरों में,
कई ख्वाब आते हैं, चले जाते हैं।
छोड़ कर अंतर्मन में
एक अजीब सा रिक्त स्थान,
फिर नहीं आती नींद भी
उनींदी आंखों मे।
रहता है इंतज़ार,
कि हो सकता है
आ जाए फिर कोई ख्वाब नया।
फिर
घंटों के इंतेज़ार से थकी आंखें
ढूंढने लगती हैं आंखों की कोरों के आंगन में,
इस उम्मीद के साथ कि
कहीं चोरी से छिपकर बैठा हो कोई ख्वाब,
किसी कोने मे।
फिर होकर मायूस सो जाती हैं ये चुपचाप,
भूखे होने पर भी न मिलने पर रोटी,
सो जाता है कोई बच्चा जैसे रो कर।
(2)
कई बार आते हैं कई ख्वाब इन आंखों में
एक दम धूल धुसरित
जैसे आय हो कोई बच्चा खेल कर
गांव धूल भरे मैदानों से।
(3)
पलकों के दरवाज़े पर दस्तक दे कर
लौट जाते हैं कई ख्वाब,
वैसे तो बच्चों की आदत होती है
दरवाज़े पर घंटी बजाकर भागने की।
(4)
ख्वाब आते हैं
मगर शरमाए से, सकुचाए से
जैसे आई हो कोई तरुणी
अपने प्रिय से प्रथम मिलन को।
और जैसे हि समझना चाहता हूं उनको,
विदाई का वक़्त हो जाता है।
(5)
कहा जाता है कि नींद में आए हुए
ख्वाब उन सभी कृत्यों का प्रतिरूप हैं,
जो नहीं कर पाता इंसान जागते हुए।
अगर ऐसा है तो खुदा करे कि,
आज नींद आये,
तो मेरा दामन छोड़कर न जाए।
(6)
कई बार मन करता है कि,
ख्वाबों के आंचल में
मुंह ढांक कर सो जाऊं
जैसे सोता था कभी बचपन में
अपनी मां के आंचल में।
पर नहीं कर सकता।
मैं बड़ा हो गया हूं।
लेखक:-
विकास परिहार
at
01:13
5
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श्रेणी:- नया प्रयोग
Sunday, May 11, 2008
मौन और संगीत
क्या होता संगीत मौन में पूछ रहे क्या कोलाहल से।
समय ने जो भी घाव दिए हैं कहां धुले हैं वो दृगजल से।
अपने मन में हमने हरदम बैर-भाव ही तो पाले हैं।
फूट रहे हैं जो इस जग में वो अपने ही तो छाले हैं।
देख के स्थिति इस जग की पीड़ाएं मन में उठती हैं।
सकल हृदय की अवगुंठन में वे आपस में ही गुथती हैं।
कैसे होता है छल जग में कैसे पूछें इक निश्छल से।
मृत्यु है तृप्ति जीवन की,जीवन है अतृप्त पिपासा।
पल-प्रतिपल बढ़ती जाती हैं मानव जीवन की अभिलाषा।
ऐसा कौन मनुज इस जग में जिसने दुःख को न पाया हो।
कौन है जो सुख तो लाया हो पर पीड़ाएं न लाया हो।
कहां रही है दूर सफलता मानव इच्छा के भुजबल से।
लेखक:-
विकास परिहार
at
23:32
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श्रेणी:- कवितायें
Thursday, May 8, 2008
ज़िंदगी का नाम
समय के पहियों पर दौड़ती जाती है ज़िंदगी
अविरत, अविराम.
सुबह उठ कर वही दिनचर्या,
दोपहर को वही ऑफिस की झिक-झिक,
शाम को वही तन्हाई, वही जाम.
ऐसे ही चुकते हुए जाम के साथ,
चुकती हुई शाम के साथ,
चुक जाता है ज़िंदगी का भी नाम.
लेखक:-
विकास परिहार
at
16:16
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श्रेणी:- नया प्रयोग
Thursday, April 10, 2008
ई है दिल्ली नगरिया तू देख बबुआ
भैया जबलपुर से चढ़ कर मैं पहुँचा दिल्ली। रेल्वे स्टेशन से बाहर निकलते ही मेरा तार्रुफ हुआ दिल्ली की तथाकथित लाइफ लाइन मेरा मतलब है ब्लू लाइन से। ऊपर वाले का नाम ले कर चढ़ा तो सही पर दिल अन्दर से धौंकनी की तरह धुकधुका रहा था। धीरे धीरे बस में और लोगों का चढ़ना भी शुरु हुआ तो लगा जैसे पूरी दिल्ली इसी बस में घुस जाएगी। अब हालात यह थे कि बस में पैर रखने को भी जगह नहीं थी। अपने सामने ही आकर खड़ी हुई एक लगभग 40 वर्षीय महिला को खड़ा देख कर मेरे से अपने कस्बाई संस्कार छोड़े नहीं गए और मैं अपनी सीट छोड़ कर खड़ा हो गया। उस महिला ने एक बारगी मुझे देखा और बैठते हुए पूछा कि कहां के रहने वाले हो। मैंने बड़े आश्चर्य से पूछा कि आपको कैसे मालूम कि मैं बाहर से आया हूं। मेरे इस प्रश्न पर उसने मुस्कुराते हुए कहा कि बचपन से दिल्ली में रह रही हूं। मैंने दिल्ली को और यहां के लोगों को दोनो को बदलते हुए देखा है। इतने में एक स्टॉप आया तो चड़ती हुई भी भीड़ ने मुझे और पीछे की ओर धकेल दिया।
अब मैं चुपचाप खड़ा था तो मैंने अपना मनपसंद कार्य यानि कि लोगों को नोटिस करना शुरू कर दिया। तो देखा कि जैसे कोई अपने ऑफिस के सारे टेंशन अपने साथ घर ले जा रहा हो तो कोई अभी से ही घर पहुंच कर बीवी से मिलने वाले टेंशनों की नई फसल को ले कर परेशान लग रहा था। कुछ लोग शराफत का लबादा ओढ़े हुए खड़े ज़रूर थे पर उनकी नज़रें सभी से नज़र चुरा कर बगल की सीट पर बैठी हुई लड़की के वी-नेक गले के अन्दर की खाई के अन्धेरे मे अपने ढलते हुए योवन और पुरूषार्थ की खोज कर रहे थे। तो कुछ लोग बैठी हुई अधेड़ औरत के ब्लाऊज़ में से छनते हुए ब्रा को देख कर ही तृप्त हो रहे थे। इतने में बस रुकी और एक झटके में मेरा, ये लोगों के मूल्यांकन का, सिलसिला टूट गया। नज़र बस के दरवाज़े पर अटक गई। एक सुगढ़ काया वाली सुन्दर लड़की उस दरवाज़े से अन्दर चढ़ गई। नीले सूट में उसका रूप ऐसा लग रहा था जैसे सागर के निर्मल नीले जल के बीच एक सफेद कमल खिला हो। अब तक अपने-अपने कार्यों मे व्यस्त लोगों के बीच मे हलचल हुई। खड़े हुए लोगों ने थोड़ा थोड़ा सरक कर जगह बनाई जिससे वह अन्दर आ सके। परंतु जगह बनाते समय इतनी सावधानी बरती गई कि जगह सिर्फ उतनी ही बने जितने में वह जब गुज़रे तो उन्हें उसके शरीर के अंगों का मात्र स्पर्श ही न मिले बल्कि उसके अंग-प्रत्यंग उनके शरीरों से बाकायदा रगड़ते हुए जाएं। वह लड़की भी शायद इस स्थिति की आदी थी। वह भी अपने शरीर को भवनाशून्य कर के उन लोगों के शरीरों से शरीर को रगड़ते हुए अपने को बस की एक ऐसी जगह तक खींच कर ले गई जहां पर उसे खड़े होने को जगह मिल जाए और जहां उसके शरीर से हो रहा अन्य शरीरों का स्पर्श कम से कम उतना तो कम हो जाए जितने के लिए उसका शरीर अनुकूलित हो चुका है। मैं खड़ा खड़ा उस लड़की को और उसकी स्थिति को एक बिजूके की तरह देख रहा था। थोड़ी देर में मेरी मनःस्थिति को भांप कर उस महिला ने अपनी सीट छोड़ कर उस लड़की को दे दी और खुद उसके पास खड़ी हो गई। उसके बाद वाले स्टॉप पर मैं और वह महिला दोनो उतर गए। कुछ देर तक हम दोनो के बीच एक मौन संवाद चला फिर इस मौन को तोड़ कर उस महिला ने कहा कि तुम्हारे लिये यह नई घटना थी इसीलिए तुम्हे शायद बुरा लग रहा हो पर यहां ये सब आम बात है। मैं भी चुप था पर मैने बस इतना ही कहा कि ये चाहे कस्बाई मानसिकता हो या मेरा पिछड़ापन पर मैं तो बस यही मानता हूं कि शरीर की रगड़ से बच्चे तो पैदा किए जा सकते हैं परंतु रिश्ते नहीं। वह महिला मेरी इस बात पर कुछ न कह पाई और हम दोनो ने एक दूसरे को अलविदा कह कर अपने-अपने रास्ते की ओर रुख कर लिया।
लेखक:-
विकास परिहार
at
21:54
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श्रेणी:- कथायें एवं किस्से
Tuesday, April 8, 2008
रात
मेंढक की टर्र-टर्र,
झींगुर के स्वर,
भयभीत मन कंपित कर,
तन पर चुभते हवाओं के शर,
अंतर उद्वेलित बाहर नीरव,
मन में होते आतंकित अनुभव,
मंथर गति से चलती वात;
यही है रात।
लेखक:-
विकास परिहार
at
23:21
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श्रेणी:- क्षणिकाएं एवं अशआर
Sunday, March 23, 2008
तन्हा रातें
तुम क्या जानो कि कैसे डसती हैं तन्हा रातें।
हम पर हर रोज़ ही हंसती हैं तन्हा रातें।
कौन कहता है कि हर चीज़ यहां महगी है,
यहां तो धूल से भी सस्ती है तन्हा रातें।
दिन तो कट जाते हैं जैसे तैसे,
बन कर के आग बरसतीं हैं तन्हा रातें।
कहीं नहीं है यहां प्यार अम्न की खुश्बू,
डर-औ-दहशत की बस्ती है यहां तन्हा रातें।
लेखक:-
विकास परिहार
at
23:50
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Monday, March 17, 2008
वर्गांतरण
एक कॉफी तीस रूपए
अपानी जेब से गए
उसके बाद एक पिज्जा आया
उसके सॉस की नदी में हमने,
पचास का नोट बहाया
इसके बाद हम केफे कॉफी डे
के गेट से सीना तान बाहर निकले,
अपनी गाडी पर चढ़ गए
अन्दर से खुश थे,
मध्यम से उच्च वर्ग के
पथ पर बढ़ गए
लेखक:-
विकास परिहार
at
22:18
2
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श्रेणी:- नया प्रयोग
ईमानदार प्रयास
बहुत बात करते हैं,
हम विकास की
भूख की, प्यास की
महिलाओं की,
दमित इच्छाओं की
हर दिन हर पल हर क्षण,
परिस्थितियों के बदलने
की आस करते हैं
पर हम स्वयं से एक प्रश्न करें ,
क्या हम कोई ईमानदार,
प्रयास करते हैं ?
लेखक:-
विकास परिहार
at
14:19
0
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श्रेणी:- नया प्रयोग
Sunday, March 16, 2008
हर शाम मेरा ठिकाना बदलता है
रातभर कोई भौंरा मचलता है
तब जाकर फूल कोई खिलता है
तुम्हें क्या मालूम अहमियत भूख की,
एक रोटी के लिए तवा घंटों जलता है
ज़िंदगी क्या है हमसे पूछो,
जब से पैदा हुए हैं- बस चलता है
ख्वाहिशें आदमी की पहुँचने लगीं फलक तक,
हर रोज़ एक तारा कम निकलता है
मुसाफिर हूँ मैं मेरा ठिकाना न पूछ,
हर शाम मेरा ठिकाना बदलता है
लेखक:-
विकास परिहार
at
02:32
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श्रेणी:- गीत एवं गज़ल
Friday, March 14, 2008
मुम्बई की सड़कें
कभी देख कर इतने पापों को होते
वो है कौन जिसकी भुजाएं न फड़के
न जाने हैं क्यों मौन मुम्बई की सड़कें
न बदलीं कभी ये बदलते समय में
गम में, खुशी में, पराजय में, जय में
देखा इन्होने सदियाँ बदलते
ज़मीन पर चमकते सितारों को चलते
देखे कई इनने बम के धमाके देखे ,
देखे इन्होंने इंसान पिघलते
फ़िर भी कभी कुछ भी बोलीं नहीं ये,
सिसकतीं रहीं अपने अन्तरह्रदय में
जलाया इन्हें गर्मियों में खुदा ने
डुबाया इन्हें बेदर्द आसमाँ ने
मगर ये यूं ही बस चली जा रहीं हैं,
कई बार छोडा इन्हें कारवां ने
कभी ये हंसी हैं बिछड़ते हुए भी,
कभी ये हैं रोईं अन्तः प्रणय में
देखा खुले आम जिस्मों को बिकते
कड़ी धूप में आम इंसान को सिकते
सदा आदमी इनने भागते ही देखा,
न देखा इन्होने किसी को भी टिकते
झूमीन हैं ये अलमस्त उत्सवों में,
जलीं हैं स्वयं ये धधकते प्रलय में
लेखक:-
विकास परिहार
at
10:15
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श्रेणी:- कवितायें
Friday, February 8, 2008
हाईकू
1
विधि का लेख
लिखता है ईश्वर
झेले इंसान।
2
घने अंधेरे
में चमके प्रकाश
और अधिक।
3
करते जाओ
पाने की मत सोचो
जीवन सार।
4
दर-ब-दर
ठोकरें खाता हुआ
घूमता सच।
5
जीवन नैया
मझदार में डोले
संभाले कौन?
6
रंग बिरंगे
रंग संग लेकर
आया फागुन।
7
कांटों के बीच
खिलखिलाता फूल
देता प्रेरणा।
8
भीतरी कुंठा
नयनों के द्वार से
आई बाहर।
9
खारे जल से
धुल गए विषाद
मन पावन।
10
मृत्यु को जीना
जीवन विष पीना
है जिजीविषा
11
टेढ़े रहो तो
रहता है संसार
सदैव सीधा
12
मन की पीड़ा
छाई बन बादल
बरसी आंखें
13
चलती साथ
पटरियां रेल की
फिर भी मौन
14
मीरा का प्रेम
सच होते हुए भी
रहा अधूरा
15
सितारे छिपे
बादलों की ओट में
सूना आकाश
16
तुमने दिए
जिन गीतों को स्वर
हुए अमर
17
सागर में भी
रहकर मछली
प्यासी ही रही
लेखक:-
विकास परिहार
at
21:50
3
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श्रेणी:- हाईकू